लखनऊ : विश्व आर्द्रभूमि दिवस के अवसर पर गोमती टास्क फोर्स (GTF), 137 कॉम्पोज़िट इकोलॉजिकल टास्क फोर्स बटालियन (टेरिटोरियल आर्मी) 39 गोरखा राइफल्स, एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में हुलास खेड़ा आर्द्रभूमि, जिसे स्थानीय रूप से करेला झील के नाम से जाना जाता है, मोहनलालगंज तहसील में स्वच्छता एवं जन-जागरूकता अभियान आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करना तथा प्रदूषण एवं क्षरण से इनके संरक्षण की आवश्यकता पर जन-जागरूकता फैलाना था। अभियान में बीबीएयू के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी, गोमती टास्क फोर्स के जवान, ग्रामवासी तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने सक्रिय भागीदारी की।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) वेंकटेश दत्ता, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग, बीबीएयू ने कहा कि आर्द्रभूमियाँ पारिस्थितिकी तंत्र की “प्राकृतिक किडनी” की तरह कार्य करती हैं।

उन्होंने बताया कि आर्द्रभूमियाँ भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण तथा जैव-विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और इनके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सामुदायिक सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों द्वारा आर्द्रभूमि से जल नमूने एकत्र किए गए, जिनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा। इसके साथ ही प्रतिभागियों ने पक्षी अवलोकन (बर्ड वॉचिंग) गतिविधि में भी भाग लिया, जिससे आर्द्रभूमि के पक्षी आवास के रूप में महत्व को रेखांकित किया गया।
मेजर कवंदरदीप सिंग नागी, अधिकारी कमांडिंग, गोमती टास्क फोर्स ने कहा कि हुलास खेड़ा जैसी आर्द्रभूमियों का संरक्षण गोमती नदी तंत्र के समग्र स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए निरंतर जन-जागरूकता एवं जिम्मेदार नागरिक व्यवहार की आवश्यकता पर बल दिया।

ग्राम प्रधान अभिषेक दीक्षित ने इस संयुक्त पहल की सराहना करते हुए आर्द्रभूमि के संरक्षण एवं प्लास्टिक मुक्त बनाए रखने के लिए ग्राम समुदाय के पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।
इस अवसर पर बिसलेरी के ‘बॉटल्स फॉर चेंज’ अभियान के प्रतिनिधि ने प्लास्टिक पुनर्चक्रण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार प्रयुक्त प्लास्टिक बोतलों को एकत्र कर उन्हें उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जिससे परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और जल स्रोतों को प्लास्टिक प्रदूषण से बचाया जा सकता है।
कार्यक्रम का समापन आर्द्रभूमि क्षेत्र में स्वच्छता अभियान के साथ हुआ, जिसमें जल सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता एवं सतत विकास के लिए आर्द्रभूमियों के संरक्षण का संदेश दिया गया।













