लखनऊ : टाइम क्या हुआ? सुबह उठते ही इस सवाल का जवाब आप अपने फोन से पूछते हैं। कॉलेज डेज में क्लास ज्वाइन करने से पहले व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करते हैं। यहीं से आप मोबाइल की गिरफ्त में आते हैं।
ऐसे ही डिजिटल डोपामिन से जुड़े विभिन्न विषयों पर दो दिवसीय ‘साइकॉन 2026’ राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस दौरान चर्चा की गई कि तकनीक तेजी से हमारी जिंदगी का हिस्सा बन रही है और इसका असर हमारे सोचने-समझने, भावनाओं, व्यवहार और फैसले लेने क्षमताओं तक में दिखाई देने लगा है।
‘माइंड इन द मशीन’ थीम के साथ मानसिक स्वास्थ्य और तकनीक के बदलते संबंधों पर चर्चा
निर्वाण हॉस्पिटल द्वारा आयोजित सम्मेलन में देश भर के मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, शोधकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यक्रम उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य सलाहकार, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश अवनीश अवस्थी उपस्थित रहे।
इसके अलावा निर्वाण हॉस्पिटल के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. एच. के. अग्रवाल, डॉ. दीप्तांशु अग्रवाल, मेडिकल डायरेक्टर, निर्वाण हॉस्पिटल, डॉ. टी.बी. सिंह,
पूर्व विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, आईएचबीएएस, दिल्ली, डॉ. प्रांजल अग्रवाल, डायरेक्टर, निर्वाण हॉस्पिटल, अस्था शर्मा, विभागाध्यक्ष – क्लिनिकल साइकोलॉजी, निर्वाण हॉस्पिटल और संगठन सचिव – साइकॉन 2026 हिमांशु सिंह, डायरेक्टर, कम्पोजिट रीजनल सेंटर (सीआरसी), लखनऊ भी शामिल रहे।
सम्मेलन की थीम ‘माइंड इन द मशीन टेक्नोलॉजी और मानव जीवविज्ञान का संबंध’ रखी गई। इस थीम के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि तकनीक किस तरह मानव मस्तिष्क, भावनाओं और व्यवहार को प्रभावित कर रही है।
कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बताया कि लाइक्स और शेयर के फेर में आकर लोग अपना मानसिक सुकून खो रहे हैं। यहां तक कि प्रेग्नेंट महिलाओं में अधिक फोन का इस्तेमाल उनके होने वाले बच्चे पर बुरा असर डाल रहा है। वहीं छोटे बच्चों में अधिक स्क्रीन टाइम मोटापे से लेकर ड्रग अब्यूज, अनिद्रा और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।
डिजिटल डोपामिन की गिरफ्त में जिंदगी, ‘साइकॉन 2026’ में विशेषज्ञों ने जताई चिंता
सम्मेलन के पहले दिन हमेशा ऑनलाइन रहने के नुकसान, यौन आक्रामकता की शुरुआत, कहानियों का मनोविज्ञान, ऑनलाइन के अधिक इस्तेमाल से लेखन पर प्रभाव, आज की सुस्त लाइफस्टाइल और डिजिटल दुनिया से इंसानी शरीर में बदलाव, उम्र के साथ बदलती तकनीक और उसके असर जैसे पर चर्चा की गई।
निर्वाण हॉस्पिटल के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. एच. के. अग्रवाल ने कहा कि तकनीक आज मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे रही है। हमारा उद्देश्य है कि विशेषज्ञ एक मंच पर आकर इस बदलाव को समझें और ऐसे समाधान खोजें जो मरीजों के लिए सुरक्षित और प्रभावी हों।
सम्मेलन के मुख्य अतिथि एवं मुख्य सलाहकार, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश अवनीश अवस्थी (से.नि. आईएएस) ने कहा कि मेंटल हेल्थ का एरिया देश में सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सेंसेटिव है, जिसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। कोरोना के दौरान बड़ी संख्या में लोग घर पर बंद थे।
इस दौरान घर पर वर्किंग प्रोफेशनल्स, महिलाएं और स्टूडेंट बैठे थे और मानसिक तनाव से जूझ रहे थे। ऐसे में सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के साथ मिलकर उनकी मदद की।
अगर हम क्लिनिकल सायकलॉजी और मेंटल हेल्थ के एरिया में एआई को जोड़ सकें तो इसके परिणाम अभूतपूर्व हो सकते हैं। इसके साथ ही क्लिनिकल सायकलॉजी की मदद से ड्रग एब्यूज और रिहैबिलिटेशन जैसे विषयों पर समाधान खोजने की अत्यंत आवश्यकता है क्योंकि स्टूडेंट्स में सिर्फ लड़के ही नहीं लड़कियां भी इसकी गिरफ्त में है।
प्रो. (डॉ.) तेज बहादुर सिंह पूर्व प्रोफेसर, क्लिनिकल साइकोलॉजी ने कहा कि आज क्लिनिकल साइकोलॉजी एक ऐसे दौर में खड़ी है जहाँ मानवीय समझ और तेजी से बदलती तकनीक साथ-साथ आगे बढ़ रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जिम्मेदारी केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती दुनिया की नई चुनौतियों को समझना भी उतना ही जरूरी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकों का उपयोग मानसिक रोगों की शुरुआती पहचान, बेहतर आकलन और व्यक्ति-केंद्रित उपचार में नई संभावनाएँ खोल रहा है। लेकिन तकनीक के साथ संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण हमेशा केंद्र में रहना चाहिए।
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