आम महोत्सव में सबको लुभा रही आम की लाल किस्में

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लखनऊ। अवध शिल्पग्राम में आयोजित आम महोत्सव में आम की लाल किस्मों से अप्रत्याशित रूप से रौनक बढ़ा रही हैं। लोग अनायास ही लाल रंग की किस्मों की तरफ खिंचे चले जाते हैं और संबंधित जानकारी प्राप्त करते हैं।

लगभग तीन दशक पहले आम महोत्सव में बहुत कम संख्या में लाल रंग की किस्में  प्रदर्शित की जाती थी लेकिन अब लाल किस्म के प्रदर्शन की संख्या सैकड़ों में पहुंच गई है। हरीश ताल पर कोई ना कोई लाल रंग की किस्म प्रदर्शित की गई है।

लखनऊ स्थित केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ.शैलेंद्र राजन के अनुसार लाल रंग की किस्में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। डॉ. राजन 36 वर्षों से आम की नई किस्में विकसित करने तथा प्रदर्शनी में विशेष योगदान दे रहे हैं।लाल आम के फलों की तरफ हर कोई आकर्षित होता है।

महोत्सव हो रहा और रंगीन, महोत्सव में बढ़ता लाल किस्मों का प्रभाव

कुछ दशक पहले आम के मेलों में केवल भारतीय लाल रंग की किस्मों जैसे हुस्नारा, वनराज, सुरखा, सुरखा वर्मा, सिदुरिया, गुलाब खास इत्यादि का बोलबाला था। हालांकि 80 के दशक में टॉमी एटकिंस, एल्डन और सेंसेशन जैसी रंगीन किस्मों को  लखनऊ में सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर और नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा अमेरिका से मंगाया गया।

लाल रंग की इन किस्मों के आकर्षण के कारण इनके पौधे विभिन्न सरकारी एजेंसियों और निजी नर्सरी द्वारा व्यापक रूप से बनाए जाने लगे। इस बीच, इन किस्मों को नई किस्मों के विकास के लिए शंकरण में माता या पिता के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

आम्रपाली, दशहरी और अल्फांसो जैसी भारतीय किस्मों के साथ इन विदेशी आमों को नर या मादा के रूप में संकरित करके रंगीन किस में विकसित की गई है। टॉमी एटकिंस और सेंसेशन जैसी विदेशी रंगीन आम की किस्मों का स्वाद सपाट होता है और यह भारतीय स्वाद के अनुरूप नहीं  है।

सुगंधित और मीठे आम भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। हालांकि, लाल किस्मों का रंग उपभोक्ता को आकर्षित करता है और ग्राहक अधिक कीमत देने में भी संकोच नहीं करते हैं। विदेशी किस्में आम तौर पर कम मीठी होती हैं, लेकिन इन्हें लंबे समय तक संग्रहीत किया जा सकता है।

अनुसंधान संस्थानों ने एक दर्जन से भी अधिक लाल रंग की किस्मों का विकास किया है। डॉ. राजन ने कहा कि सीआईएसएच, लखनऊ में 36 वर्षों के आम प्रजनन कार्य में अंबिका और अरुणिका के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। इसके अतिरिक्त कई किस्में आने वाले वर्षों में संस्थान द्वारा लोक अर्पित करने की संभावना है।

आम के मेले में संस्थान के स्टॉल पर आकर्षक लाल रंग के संकरों की अच्छी खासी संख्या है। दिल्ली के पूसा संस्थान ने लाल रंग की कई किस्में जैसे पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा ललिता और पूसा अरुणिमा जीत करके जारी किया है और उनकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है।

सीआईएसएच द्वारा विकसित अंबिका और अरुणिका को आम महोत्सव में कई प्रतियोगियों ने रखा है। अन्य लाल किस्में जैसे पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा लालिमा भी देखी जा सकती है। बेंगलुरू स्थित बागवानी संस्थान द्वारा विकसित अर्का अरुणा, अर्का अनमोल एवं अर्का पुनीत को भी प्रदर्शित किया गया है।

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विदेशी लाल रंग की किस्मों में टॉमी एटकिंस, सेंसेशन, ओस्टीन, लिली आदि प्रमुख है। पारंपरिक रंगीन किस्मों में हुस्ने आरा, वनराज  सुरखा मटियारा, नाज़ुक बदन, याकुती और गुलाब खास शामिल हैं। डॉ. राजन ने कहा कि अम्बिका और अरुणिका की मांग पौधे के बौने आकार व किचन गार्डन के लिए उपयुक्त होने के कारण अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है।

अरुणिका किस्म के पौधे आम्रपाली से भी छोटे आकार के होते हैं। इसी कारण से किचन गार्डन के लिए अरूणिका को अच्छी बौनी किस्मों में से एक माना जाता है। प्रारंभ में, नई रंगीन किस्मों के पौधे केवल शोध संस्थानों  में उपलब्ध थे जहां इन किस्मों को विकसित किया गया था।

हालाकि उच्च मांग के कारण, पौधों को प्राइवेट नर्सरी काफी संख्या में बना रही हैं जबकि रंगीन किस्मों की आड़ में नकली किस्मों की आपूर्ति करने की प्रथा भी प्रचलित है। बाजार में लाल फलों की अधिक मांग के कारण रंगीन किस्मों का उत्पादन करना किसानों के लिए भी लाभदायक है।

इन किस्मों को उच्च घनत्व में लगाया जा सकता है और पौधे केवल दो वर्षों में फल देना शुरू कर देंगे। अंबिका और अरुणिका के पेड़ों पर प्रूनिंग का अच्छा प्रभाव पड़ता है, इसलिए शाखाओं को ट्रिम कर के पौधे का आकार छोटा करके फल की उपज भी प्राप्त की जा सकती है।

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