भाकृअनुप–भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ का 75वां स्थापना दिवस धूमधाम से सम्पन्न

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भाकृअनुप–भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ का 75वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो. के. के. सिंह, पूर्व कुलसचिव, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ थे।

साथ ही डॉ. काजल चक्रवर्ती, निदेशक, भाकृअनुप –राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ तथा डॉ. टी. दामोदरन, निदेशक, भाकृअनुप –केंद्रीय उपोष्ण कटिबंधीय बागवानी संस्थान, लखनऊ विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

प्रो. के. के. सिंह ने संस्थान के उत्कृष्ट योगदान की सराहना की, विशेषकर 50 से अधिक उच्च उत्पादक, जलवायु-सहिष्णु एवं अधिक शर्करा युक्त गन्ना किस्मों के विकास के लिए, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन करती हैं।

उन्होंने स्किप-फरो तकनीक, बड-चिप तकनीक, समेकित कीट प्रबंधन  तथा गुड़ प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से मूल्य संवर्धन में संस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए संस्थान को अपने प्रयास और तेज करने होंगे।

इनमें गुड़ निर्माण इकाइयों से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना; नई एवं उन्नत किस्मों के विकास द्वारा किस्म प्रतिस्थापन की गति बढ़ाना; जल उपयोग को कम करने हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) विकसित करना; गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करना; कीट एवं रोग प्रबंधन को सुदृढ़ करना; मृदा क्षरण की समस्या का समाधान; नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में सुधार तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करना; उत्पादन लागत में कमी; मशीनीकरण को बढ़ावा; कस्टम हायरिंग केंद्रों को सशक्त बनाना; डिजिटल कृषि को प्रोत्साहन; सहयोगात्मक परियोजनाओं की शुरुआत; उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को सशक्त बनाना; स्टार्ट-अप को समर्थन; जैव-एथेनॉल एवं जैव-प्लास्टिक के क्षेत्र में हरित प्रौद्योगिकी का विकास; प्रभावी अंतःफसली प्रणाली को बढ़ावा; तथा लघु स्तर की गन्ना कटाई मशीन की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करना शामिल है।

उन्होंने आगे कहा कि संस्थान को अपनी प्रौद्योगिकियों का व्यवस्थित प्रभाव विश्लेषण (इम्पैक्ट एनालिसिस) करना चाहिए, जिससे उनके प्रभाव और पहुंच का आकलन किया जा सके।

भाकृअनुप –भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. दिनेश सिंह ने बताया कि वर्ष 2025 के दौरान पादप किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण (PPV&FRA) के साथ गन्ने की दस किस्में पंजीकृत की गईं। साथ ही, AICRP(S) की किस्म पहचान समिति को गन्ना किस्म कोलक 19204 (इक्षु-18) (मध्य देर) के विकसित हेतु एक पहचान प्रस्ताव भेजा गया।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2024-25 के दौरान संस्थान ने 10,150 क्विंटल बीज गन्ना उत्पादन किया तथा गन्ना विकास परिषद के माध्यम से नई विमोचित किस्में (कोलक 16202 एवं कोलक 15466) की 21 लाख से अधिक एकल कलिकाएं उपलब्ध कराईं। इसके अतिरिक्त लगभग 6 लाख कलिकाएं सीधे किसानों को ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से वितरित की गईं।

किस्म कोलक 14201 की अत्यधिक मांग देखी गई और उपलब्ध संपूर्ण बीज भंडार उत्तर प्रदेश में वितरित किया गया। अनुमान है कि वर्ष 2025-26 तक इसका क्षेत्रफल बढ़कर लगभग 1.72 लाख हेक्टेयर हो जाएगा।

उन्होंने संस्थान में नई मशीनरी एवं उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास, पेटेंट एवं कॉपीराइट उपलब्धियों तथा गन्ना एवं चुकंदर अनुसंधान से जुड़े विभिन्न संगठनों के साथ सहयोग पर भी प्रकाश डाला। साथ ही संस्थान के आउटरीच कार्यक्रमों एवं ब्रीडर सीड उत्पादन गतिविधियों की जानकारी दी।

विशिष्ट अतिथि डॉ. काजल चक्रवर्ती, निदेशक, निदेशक, भाकृअनुप –राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ ने कहा कि गन्ना किसानों की आजीविका की आधारशिला है।

उन्होंने संस्थान द्वारा गन्ना विकास में किए गए योगदान की प्रशंसा की तथा भविष्य में जैव-एथेनॉल एवं जैव-प्लास्टिक के क्षेत्र में अधिक कार्य कर संस्थान की दृश्यता और प्रभाव बढ़ाने पर बल दिया।

विशिष्ट अतिथि डॉ. टी. दामोदरन, निदेशक, भाकृअनुप –केंद्रीय उपोष्ण कटिबंधीय बागवानी संस्थान ने कहा कि भाकृअनुप –भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान ने आवश्यकता पड़ने पर सदैव सहयोग प्रदान किया है।

उन्होंने किसानों के लिए उपयोगी एवं व्यावसायिक स्तर पर अपनाई जा सकने वाली किस्मों के विकास पर निरंतर कार्य करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने जैव-एथेनॉल उत्पादन के क्षेत्र में और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता बताई। साथ ही यह भी कहा कि गन्ना अधिक जल-आवश्यकता वाली फसल है, अतः जल संरक्षण के लिए सेंसर-आधारित सिंचाई प्रणाली विकसित करना समय की आवश्यकता है।

इस अवसर पर संस्थान के पूर्व विभागाध्यक्ष, पादप कार्यिकी एवं जैव रसायन विभाग डॉ. ए. के. श्रीवास्तव ने “गन्ना: भारतीय विरासत” विषय पर स्थापना दिवस व्याख्यान प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि गन्ना उन छह फसलों में से एक है, जिन्होंने मानव सभ्यता को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि वेद, पुराण, रावण संहिता, रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में गन्ने का उल्लेख मिलता है, जो भारत में इसके सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।

कार्यक्रम के दौरान तकनीकी बुलेटिन एवं फोल्डर का विमोचन किया गया तथा संस्थान के कार्मिकों एवं प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया। संस्थान के कार्मिकों द्वारा एक नुक्कड़ नाटक भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अनीता सावनानी द्वारा किया गया तथा कार्यक्रम के संयोजक डॉ. मनोज कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

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