डॉ. शिवानंद नौटियाल: जब राजनीति में साहित्य और विकास साथ चले

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देहरादून/पौड़ी/लखनऊ। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी बौद्धिक कौशल और जमीनी विकास का संगम याद किया जाता है, तो डॉ. शिवानंद नौटियाल का नाम सबसे ऊपर आता है।

कोठला गांव के लाल, पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री और पर्वतीय विकास मंत्री स्वर्गीय डॉ. शिवानंद नौटियाल की आज 22वीं पुण्यतिथि पूरे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मनाई जा रही है।

26 जून 1926 को पौड़ी के कोठला गांव में जन्मे डॉ. नौटियाल केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि उस ‘पहाड़ी चेतना’ के संवाहक थे, जिन्होंने कलम और कर्म दोनों से उत्तराखंड की तकदीर लिखने का प्रयास किया।

सत्ता का गलियारा और ‘शिक्षा की क्रांति’

1967 में राजनीति में कदम रखने वाले डॉ. नौटियाल का सफर ऐतिहासिक रहा। वे पौड़ी से दो बार और कर्णप्रयाग से छह बार विधायक चुने गए, जो उनकी जन-लोकप्रियता का प्रमाण है।

लेकिन उनका असली प्रभाव 1979 में दिखा, जब उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा और राज्य परिसीमन में सदस्य के रूप में अहम जिम्मेदारी निभाई।

  • संस्थागत नींव: उन्होंने अपने कार्यकाल में केवल फाइलें नहीं दौड़ाईं, बल्कि दुर्गम पहाड़ों में प्राइमरी स्कूल से लेकर इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज तक का जाल बिछाया।
  • बुनियादी ढांचा: सड़क, बिजली, पेयजल और सहकारिता को उन्होंने ‘चुनावी वादे’ के बजाय एक ‘मिशन’ के रूप में लिया, ताकि पहाड़ों से पलायन को रोका जा सके।
साहित्यिक धरोहर: लोक संस्कृति के चितेरे

डॉ. नौटियाल की पहचान केवल विधानसभा की बहसों तक सीमित नहीं थी। वे एक प्रखर शोधकर्ता और साहित्यकार भी थे। उनका शोध ग्रंथ ‘गढ़वाल के लोकनृत्य गीत’ आज भी शोधार्थियों के लिए एक प्रमाणिक दस्तावेज है।

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष के तौर पर रहते हुए नौटियाल ने कई सार्थक कार्य किए। इस दौरान उन्होंने साहित्यकारों और शोधकारों को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

गढ़वाली लोकमानस की आत्मा को समझने के लिए नौटियाल जी की रचनाएं एक खिड़की की तरह 

उनकी प्रमुख कृतियां जैसे ‘छम घुंघरू बाजला’, ‘नेफा की लोककथाएं’ और ‘कुमाऊं दर्शन’ ने हिमालयी संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसी साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इसके अलावा कई राज्यों ने उन्हें सम्मानित किया।

आज की प्रासंगिकता

2004 में भले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया हो, लेकिन आज जब उत्तराखंड में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सहकारिता पर बहस होती है, तो डॉ. नौटियाल के कार्य एक मानक (Benchmark) की तरह सामने आते हैं। वे एक ऐसे ‘ओजस्वी वक्ता’ थे, जो आंकड़ों से ज्यादा जन-भावनाओं की भाषा समझते थे।

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