नोएडा : ऐसे समय में जब भारतीय खेल जगत क्रिकेट से आगे अपनी अगली बड़ी राष्ट्रीय खेल पहचान की तलाश में है, प्रो रेसलिंग लीग के चेयरमैन दयान फारूक़ी देश की सबसे पुरानी खेल परंपराओं में से एक को नए सिरे से गढ़ने के साहसिक मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं।
उनकी सोच केवल एक सफल लीग चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कुश्ती को एक सांस्कृतिक शक्ति में बदलने की है—ऐसी शक्ति जो आधुनिक दर्शकों को आकर्षित करे और साथ ही भारत की खेल आत्मा से गहराई से जुड़ी रहे।
परंपरा और प्रोफेशनलिज़्म का संगम: पीडब्ल्यूएल में फारूक़ी का विज़न
फारूक़ी का मानना है कि कुश्ती हमेशा से भारत की डीएनए में रची-बसी रही है, जो स्वाभाविक रूप से अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय मैट तक विकसित हुई है। उनके अनुसार, इस खेल में कभी प्रतिभाया विरासत की कमी नहीं रही, बल्कि कमी रही है एक ऐसे आधुनिक मंच की, जहां इसे व्यापक स्तर पर मनाया और सराहा जा सके।
उनके नेतृत्व में पीडब्ल्यूएल उसी सेतु के रूप में उभर रही है—एक ऐसी लीग जो कुश्ती की दृश्यता, कहानी कहने की शैली और प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए डिज़ाइन की गई है, ताकि यह आधुनिक पेशेवर खेलों की अपेक्षित भव्यता के साथ अपनी घरेलू जड़ों का सम्मान भी बनाए रखे।
व्यावसायीकरण और प्रामाणिकता के बीच संतुलन फारूक़ी की सोच का केंद्रीय आधार है।जहां पीडब्ल्यूएल आधुनिक प्रोडक्शन, वैश्विक मानकों और लीग अर्थशास्त्र को अपनाती है, वहीं भारतीय कुश्ती का मूल स्वरूप अछूता रहता है।
लीग अनुशासन, जुझारूपन और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए रखती है, ताकि कुश्ती का वैश्विक विस्तार उसकी भारतीय पहचान को कमजोर किए बिना हो। फारूक़ी की दीर्घ कालिक महत्वाकांक्षा स्पष्ट है—कुश्ती को एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनाना, जो फिर भी पूरी तरह भारतीय महसूस हो।
फारूक़ी के अनुसार, सफलता की एक अहम कसौटी तब होगी जब कुश्ती युवा पीढ़ी के लिए आकांक्षात्मक बनेगी।उनकी सोच भरे हुए एरीना और प्रसारण आंकड़ों से आगे जाती है—वे कुश्ती को जेनज़ी की जीवनशैली बनते देखना चाहते हैं।
पीडब्ल्यूएल में युवा एथलीटों की बढ़ती भागीदारी पहले ही इस बदलाव का संकेत दे रही है, क्योंकि लीग एक नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही है कि वे कुश्ती को सीमित दायरे का खेल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और गौरव के साथ एक मुख्यधारा करियर के रूप में देखें।
महिला कुश्ती पीडब्ल्यूएल की विकसित होती संरचना के केंद्र में है, जो फारूक़ी की सार्थक समावेशन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
2026 के फॉर्मेट में लैंगिक समानता पर नए सिरे से ज़ोर दिया गया है, जिसके तहत लीग ठोस संरचनात्मक बदलाव लागू कर रही है, ताकि महिला कुश्ती प्रतिस्पर्धी, दृश्य और अभिन्न बने—केवल प्रतीकात्मक नहीं।
निरंतर एक्सपोज़र, प्रतिस्पर्धात्मक गहराई और स्पष्ट प्रगति मार्ग बनाकर, पीडब्ल्यूएल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय—दोनों स्तरों पर महिला कुश्ती में वास्तविक बदलाव लाने का लक्ष्य रखती है।
आने वाले दशक की ओर देखते हुए, फारूक़ी पीडब्ल्यूएल को भारत के जमीनी खेल पारिस्थिति की तंत्र का एक मजबूत स्तंभ मानते हैं।
उनका विरासत लक्ष्य महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ उद्देश्यपूर्ण भी है—कुश्ती को वही जुनून, आकांक्षा और जन-आकर्षण दिलाना जो क्रिकेट को प्राप्त है, और साथ ही निरंतर विश्वस्तरीय व ओलंपिक चैंपियन तैयार करना।
यदि यह दृष्टि साकार होती है, तो दयान फारूक़ी की सोच न केवल प्रो रेसलिंग लीग को नई परिभाषा देगी, बल्कि भारत के खेल भविष्य के केंद्र में कुश्ती का उसका उचित स्थान भी सुनिश्चित करेगी।
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