अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान होगा।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की तुलना भारत की लोकसभा से की जा सकती है जबकि सीनेट वहां की संसद के उच्च सदन के रूप में कार्य करती है। हालांकि भारत की राज्यसभा के विपरीत अमेरिकी सीनेट के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता है।
प्रतिनिधि सभा के चुनाव भारत की लोकसभा की तरह निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली से होते हैं। इसमें अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व ज्यादा होता है। उदाहरण के लिए, कैलिफोर्निया प्रतिनिधि सभा में सबसे अधिक 52 सदस्य भेजता है, ठीक उसी तरह जैसे उत्तर प्रदेश भारत की लोकसभा में 80 सांसद भेजता है।
हालांकि अमेरिकी सीनेट की व्यवस्था भारतीय राज्यसभा से अलग है। अमेरिका के प्रत्येक राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं, चाहे उसकी जनसंख्या कितनी भी हो।
इस प्रकार छह लाख से कम आबादी वाले व्योमिंग राज्य को भी सीनेट में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलता है जितना लगभग चार करोड़ आबादी वाले कैलिफोर्निया को। इस व्यवस्था के कारण छोटे और मुख्य रूप से ग्रामीण राज्यों को सीनेट में उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व प्राप्त होता है।
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों को राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता के फैसले के रूप में देखा जाता है। इसकी तुलना उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से की जा सकती है, जिनके नतीजों को भारत के 2029 के लोकसभा चुनावों के संकेत के रूप में देखा जाएगा। फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह रिपोर्ट कार्ड उत्साहजनक नहीं दिखाई देता।
इस सप्ताह जारी रॉयटर्स/इप्सोस सर्वेक्षण के अनुसार ट्रंप की लोकप्रियता घटकर 31 प्रतिशत रह गई है, जो उनके पूरे राजनीतिक करियर का सबसे निचला स्तर है। फरवरी से जारी ईरान के साथ युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई है।

रिसर्च फेलो, जियोस्ट्रैटेजी प्रोग्राम, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन, बेंगलुरु।
वॉशिंगटन पोस्ट-एबीसी-इप्सोस सर्वेक्षण में दस में से सात अमेरिकियों ने कहा कि पेट्रोल की कीमतें उनकी पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। जब मतदाताओं से पूछा गया कि वे अमेरिकी कांग्रेस में किस पार्टी को बहुमत में देखना चाहते हैं, तो रॉयटर्स के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पार्टी के मुकाबले 12 प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली।
वर्तमान में प्रतिनिधि सभा में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी के पास मामूली बहुमत है। ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी को 218 सीटों का बहुमत हासिल करने के लिए केवल कुछ अतिरिक्त सीटें जीतने की आवश्यकता है। सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें हैं जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत हासिल करने के लिए चार अतिरिक्त सीटें जीतनी होंगी।
चुनावी पूर्वानुमान लगाने वाली संस्था डिसीजन डेस्क एचक्यू के अनुसार प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत की संभावना 78 प्रतिशत और सीनेट में जीत की संभावना 57 प्रतिशत है। दोनों राजनीतिक दलों का चुनावी खर्च भी इसी स्थिति की ओर संकेत करता है।
रिपब्लिकन पार्टी टेक्सास में 10 करोड़ डॉलर (लगभग 950 करोड़ रुपये), ओहायो में नौ करोड़ डॉलर से अधिक और नेब्रास्का में डेढ़ करोड़ डॉलर खर्च कर रही है।
विशेष रूप से नेब्रास्का ऐसा राज्य है जहां ट्रंप ने पिछले चुनाव में 20 प्रतिशत अंकों से अधिक के अंतर से जीत हासिल की थी। जब किसी राजनीतिक दल को अपने पारंपरिक मजबूत गढ़ों को बचाने के लिए इतनी बड़ी धनराशि खर्च करनी पड़े, तो यह संकेत माना जाता है कि वह राजनीतिक दबाव में है।
ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अमेरिकी चुनावों के विभिन्न संभावित परिणाम राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति और भारत के लिए क्या मायने रखेंगे?
यदि रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत बनाए रखती है
यदि रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अपना बहुमत बनाए रखने में सफल रहती है या प्रतिनिधि सभा में केवल मामूली अंतर से हारती है, तो व्हाइट हाउस इसे राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के प्रति जनता के समर्थन के रूप में प्रस्तुत करेगा।
ऐसी स्थिति में ट्रंप उन मुद्दों पर और अधिक कठोर रुख अपना सकते हैं जो उनके मुख्य समर्थक वर्ग के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें आयात शुल्क, आव्रजन नीति और विदेशी नागरिकों के लिए कार्य वीजा प्रमुख हैं।
इस महीने नियोक्ता द्वारा प्रायोजित ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया पर लगाई गई रोक से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां पहले ही प्रभावित हुई हैं।
यदि चुनावी परिणाम ट्रंप के पक्ष में रहते हैं, तो उनके पास इस प्रतिबंध को जारी रखने के पर्याप्त राजनीतिक कारण होंगे। इसके अतिरिक्त भारत पर रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करने का अमेरिकी दबाव भी जारी रह सकता है। इस दबाव को सितंबर में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा दोनों दलों के समर्थन से पारित प्रतिबंध संबंधी कानून से भी मजबूती मिली है।
यदि रिपब्लिकन पार्टी चुनाव हार जाये
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या चुनावी हार राष्ट्रपति ट्रंप को अपनी आयात शुल्क नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी? संभवतः ऐसा उतना नहीं होगा जितनी कई लोगों को उम्मीद है। 24 जुलाई से भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले लगभग 70 प्रतिशत निर्यात पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया है।
यह शुल्क एक ऐसे अमेरिकी व्यापार कानून के अंतर्गत लगाया गया है जो राष्ट्रपति को अपने स्तर पर कार्रवाई करने का अधिकार देता है।
इसके अतिरिक्त इस्पात, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल कलपुर्जों पर 25 से 50 प्रतिशत तक आयात शुल्क लागू है। भारत को वस्त्र उद्योग से संबंधित उन शुल्क छूटों से भी बाहर रखा गया है जिनका लाभ उसके कुछ प्रतिस्पर्धी देशों को मिला है।
हालांकि प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव होगा। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के पास सरकारी वित्त और व्यय को नियंत्रित करने की शक्तियां हैं।
वह सरकारी अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुला सकती है और सरकारी दस्तावेज तथा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने की मांग कर सकती है।
ऐसी स्थिति में डेमोक्रेटिक पार्टी अगले दो वर्षों तक ट्रंप प्रशासन के विभिन्न फैसलों और कामकाज की जांच कर सकती है। इससे राष्ट्रपति ट्रंप के घरेलू राजनीतिक और प्रशासनिक एजेंडे को गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश पर क्या होगा इसका प्रभाव?
उत्तर प्रदेश के लिए अमेरिकी मध्यावधि चुनाव केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय नहीं हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका और राज्य के निर्यात उद्योग से जुड़े हुए हैं। उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के कुल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका खरीदता है।
इसमें भदोही और मिर्जापुर के कालीन, मुरादाबाद के पीतल के उत्पाद तथा कानपुर और आगरा के चमड़े और जूते-चप्पलों जैसे उत्पाद प्रमुख हैं।
यदि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है, तो वह आयात शुल्क समाप्त करने के लिए विधेयक पारित कर सकती है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के पास ऐसे विधेयक को वीटो करने का संवैधानिक अधिकार है। राष्ट्रपति के वीटो को निरस्त करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।
इसलिए केवल डेमोक्रेटिक पार्टी की चुनावी जीत से भारत पर लगाए गए आयात शुल्क स्वतः समाप्त नहीं होंगे। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने की नीति को डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर भी पर्याप्त समर्थन प्राप्त है।
विशेष रूप से उन डेमोक्रेटिक सांसदों में संरक्षणवादी नीतियों का समर्थन अधिक है जो अमेरिका के पारंपरिक औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के निर्यातकों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि अमेरिकी सत्ता संतुलन में बदलाव होते ही व्यापार संबंधी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
वर्ष 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की दिशा
अमेरिकी संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति अधिकतम दो कार्यकाल तक ही राष्ट्रपति पद पर रह सकता है। इसलिए डोनाल्ड ट्रंप 2028 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। हालांकि 2026 के मध्यावधि चुनावों के परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि रिपब्लिकन पार्टी 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में किस राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ेगी।
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी टेक्सास, ओहायो या नेब्रास्का जैसे उन राज्यों में जीत हासिल करती है जहां ट्रंप को पहले बड़े अंतर से समर्थन मिला था, तो यह उनके पारंपरिक मतदाता आधार में कमजोरी का संकेत होगा।
ऐसी स्थिति में 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए रिपब्लिकन पार्टी के संभावित उम्मीदवार ट्रंप की नीतियों से दूरी बनाना शुरू कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि रिपब्लिकन पार्टी मध्यावधि चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो पार्टी का अगला राष्ट्रपति उम्मीदवार ट्रंप की नीतियों और राजनीतिक विचारधारा के साथ और अधिक मजबूती से जुड़ा रह सकता है।
भारत को क्या उम्मीद रखनी चाहिए?
अमेरिकी राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब किसी राष्ट्रपति की घरेलू राजनीतिक शक्तियां सीमित हो जाती हैं, तो वह अक्सर विदेश नीति पर अधिक ध्यान केंद्रित करने लगता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विदेश नीति के अनेक क्षेत्रों में अमेरिकी राष्ट्रपति को संसद की तुलना में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते, उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन और कूटनीतिक पहल राष्ट्रपति को ऐसी राजनीतिक उपलब्धियां प्रदान कर सकती हैं जिनकी संभावना घरेलू राजनीति में सीमित हो जाती है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों पैदा कर सकती है।
एक ओर, यदि राष्ट्रपति ट्रंप विदेश नीति में शीघ्र राजनीतिक सफलता हासिल करना चाहते हैं, तो वे नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच चल रही व्यापार समझौते की बातचीत को अंतिम रूप देने के लिए अधिक इच्छुक हो सकते हैं।
दूसरी ओर, वे भारत के साथ बातचीत में आयात शुल्क और आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव बनाने के साधन के रूप में और अधिक आक्रामक तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन क्षेत्रों में अमेरिकी राष्ट्रपति के पास अपने स्तर पर निर्णय लेने की पर्याप्त शक्तियां बनी रहती हैं।
भारत को यह समझना होगा कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद नीतियों में व्यापक बदलाव के बजाय उनके क्रियान्वयन और राजनीतिक भाषा में बदलाव की संभावना अधिक है। अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अब अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने और आव्रजन नियमों को सख्त करने के पक्ष में हैं।
ये भी पढ़ें : गढ़वाल-कुमाऊं की चोटियां: पौराणिक विरासत से रणनीतिक महत्व तक
इसलिए 3 नवंबर के चुनावों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप राजनीतिक रूप से मजबूत होते हैं या कमजोर, दोनों ही परिस्थितियों में वे उन शक्तियों का अधिक उपयोग कर सकते हैं जिनका प्रयोग वह अमेरिकी कांग्रेस की स्वीकृति के बिना कर सकते हैं।
यही वे शक्तियां हैं जिनका भारत पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। इनमें आयात शुल्क, आर्थिक प्रतिबंध और वीजा संबंधी नियम शामिल हैं।
अंततः भदोही के कालीन बुनकरों और मुरादाबाद के पीतल उद्योग से जुड़े कारीगरों के लिए 3 नवंबर के अमेरिकी चुनावों के परिणामों से अधिक महत्वपूर्ण नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच चल रही व्यापार वार्ता का अंतिम परिणाम होगा।
भारत के निर्यातकों और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के पारंपरिक उद्योगों का भविष्य इस बात पर अधिक निर्भर करेगा कि दोनों देश आपसी व्यापार संबंधों में कितनी सहमति और स्थिरता स्थापित कर पाते हैं।
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। लेख में दी गई जानकारी लेखक की समझ और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। किसी भी त्रुटि या बदलाव के लिए प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होगा।












