78 साल का इंतजार खत्म, नगालैंड यूनाइटेड, राष्ट्रीय फुटबॉल का नया अध्याय

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हाईलाइट्स

  • तालिमेरेन आओ की विरासत से प्रेरित क्लब 30 अक्टूबर को खेलेगा पहला मुकाबला
  • आइजोल एफसी के सहयोग से इंडियन फुटबॉल लीग तक पहुंचा

श्रीनगर/चुमौकेदिमा। भारतीय फुटबॉल में 30 अक्टूबर की शाम एक नई कहानी शुरू होने जा रही है। श्रीनगर के टीआरसी स्टेडियम में इंडियन फुटबॉल लीग के नए सत्र के उद्घाटन मुकाबले में रियल कश्मीर के सामने नगालैंड यूनाइटेड स्पोर्ट्स क्लब होगा।

‘स्नो लेपर्ड्स’ के नाम से मशहूर मेजबान टीम के खिलाफ उतरने वाला नगालैंड यूनाइटेड अपना पहला राष्ट्रीय लीग मुकाबला खेलेगा।

महज दो साल पहले स्थापित इस क्लब की मौजूदगी पूर्वोत्तर के फुटबॉल के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। जिस राज्य ने स्वतंत्र भारत को अपना पहला ओलंपिक फुटबॉल कप्तान दिया, वहां से किसी क्लब का राष्ट्रीय लीग तक पहुंचना 78 साल के लंबे इंतजार के बाद संभव हुआ है।

नगालैंड यूनाइटेड की कहानी केवल एक नए क्लब के तेजी से आगे बढ़ने की नहीं है। इसमें स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर देने की कोशिश, फुटबॉल के प्रति पूर्वोत्तर के जुनून और एक क्लब से दूसरे क्लब तक पहुंची मदद की अहम भूमिका है। इस सफर में डॉ. तालिमेरेन आओ की विरासत और आइजोल एफसी का सहयोग भी खास मायने रखता है।

दो साल में स्थानीय मैदान से राष्ट्रीय लीग तक

नगालैंड यूनाइटेड की स्थापना 2024 में चुमौकेदिमा में हुई थी। यह कस्बा दीमापुर के आसपास के मैदानी इलाके और पहाड़ियों के बीच स्थित है।

क्लब ने ‘राइज टुगेदर’ यानी साथ मिलकर आगे बढ़ने को अपना ध्येय वाक्य बनाया। इसकी शुरुआत से ही उद्देश्य स्थानीय खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मंच देना और नगालैंड को राष्ट्रीय फुटबॉल के नक्शे पर स्थापित करना रहा है।

क्लब ने 28 जनवरी 2025 को अपना पहला प्रतिस्पर्धी मुकाबला खेला। इसी दिन चुमौकेदिमा में नए फुटबॉल स्टेडियम का उद्घाटन हुआ था। यह तारीख डॉ. तालिमेरेन आओ की 107वीं जयंती भी थी। नए मैदान पर नगालैंड यूनाइटेड का पहला मुकाबला बाराक एफसी से हुआ, जिसमें उसे 2-3 से हार का सामना करना पड़ा।

हालांकि, शुरुआती हार के बाद टीम ने अच्छा प्रदर्शन किया। नगालैंड सुपर लीग के लीग चरण में सात टीमों के बीच उसने दूसरा स्थान हासिल किया। 12 मुकाबलों में उसके खिलाफ केवल नौ गोल हुए। कोच खोगेन सिंह को सत्र का सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया, जबकि प्लेऑफ के बाद टीम तीसरे स्थान पर रही।

अक्टूबर 2025 में क्लब ने अपनी पहली बड़ी ट्रॉफी जीतकर इस प्रदर्शन को उपलब्धि में बदल दिया। नगालैंड की करीब 25 साल पुरानी एनएसएफ मार्टियर्स मेमोरियल ट्रॉफी में उसने प्री-क्वार्टर फाइनल से शुरुआत की। इसके बाद 7-0, 2-1 और 4-0 से मुकाबले जीतकर फाइनल में जगह बनाई।

18 अक्टूबर को फाइनल में नगालैंड यूनाइटेड ने चेदेमा विलेज यूथ ऑर्गनाइजेशन को 3-1 से हराया। अराप कोन्याक, जोएल हाओकिप और मंटोन कोन्याक ने गोल किए। टीम ने खिताब के साथ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी, सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर और सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर के पुरस्कार भी अपने नाम किए। खोगेन सिंह को दोबारा सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया।

तालिमेरेन आओ की विरासत से जुड़ा सफर

नगालैंड यूनाइटेड की स्थापना और राष्ट्रीय लीग तक पहुंचने की जल्दबाजी के पीछे राज्य की फुटबॉल विरासत भी एक बड़ी वजह है।

डॉ. तालिमेरेन आओ का नाम भारतीय फुटबॉल इतिहास में विशेष स्थान रखता है। वह 1948 के लंदन ओलंपिक में स्वतंत्र भारत की फुटबॉल टीम के कप्तान थे।

आओ का बचपन नागा पहाड़ियों के इम्पुर में बीता, जहां मिशन के मैदान पर बच्चे उपलब्ध साधनों से फुटबॉल खेलते थे।

कभी कपड़ों की गांठ से गेंद बनाई जाती, तो कभी बेंत से बुने गोले या चकोतरे से काम चलाया जाता था। इन्हीं परिस्थितियों में आओ ने खेलना शुरू किया और आगे चलकर देश की राष्ट्रीय टीम की अगुआई की।

31 जुलाई 1948 को पूर्वी लंदन के इलफोर्ड स्थित क्रिकलफील्ड स्टेडियम में भारत ने ओलंपिक फुटबॉल में अपना पहला मुकाबला फ्रांस के खिलाफ खेला। भारतीय टीम 1-2 से हार गई थी।

उस मुकाबले में भारत के आठ खिलाड़ी बिना जूतों के मैदान पर उतरे थे। मैच के बाद भारतीय खिलाड़ियों के नंगे पैर खेलने को लेकर पूछे गए सवाल पर आओ का जवाब आज भी याद किया जाता है—भारत में फुटबॉल खेला जाता है, जबकि दूसरे लोग बूटबॉल खेलते हैं।

आओ ने चिकित्सा के क्षेत्र में भी योगदान दिया और नगालैंड के पहले स्वास्थ्य सेवा निदेशक बने। उनके जीवन में खेल और समाज सेवा दोनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

आज भी नगालैंड में फुटबॉल का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। राज्य के अनेक गांवों में स्थानीय मैदान हैं और युवा इस खेल से गहराई से जुड़े हुए हैं।

कोच किविलु किबा के मुताबिक, यहां कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही एक और फुटबॉल मैदान मिल जाना आम बात है। इस साल उंगमा गांव के युवाओं ने बांस से करीब 15 फुट ऊंची विश्व कप ट्रॉफी की प्रतिकृति भी बनाई। स्थानीय युवाओं और बुजुर्गों ने मिलकर इसे तैयार किया।

इसके बावजूद नगालैंड के किसी क्लब को राष्ट्रीय लीग में जगह मिलने के लिए स्वतंत्र भारत के फुटबॉल इतिहास के लगभग आठ दशक गुजर गए। नगालैंड यूनाइटेड इसी दूरी को कम करने की कोशिश कर रहा है।

आइजोल एफसी ने खोला राष्ट्रीय लीग का रास्ता

राष्ट्रीय लीग तक पहुंचने के लिए नगालैंड यूनाइटेड के सामने एक लंबा रास्ता था। निचली प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ने में कई साल लग सकते थे। क्लब के बोर्ड सदस्य अबू मेथा के अनुसार, पारंपरिक रास्ते से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में काफी समय लग जाता और क्लब के पास इतना इंतजार करने का अवसर नहीं था।

इस दिशा में आइजोल एफसी का सहयोग निर्णायक साबित हुआ। मिजोरम का यह क्लब 2017 में भारतीय फुटबॉल की सबसे चर्चित उपलब्धियों में से एक हासिल कर चुका है।

उसने राष्ट्रीय लीग का खिताब जीतकर पूर्वोत्तर के फुटबॉल को नई पहचान दी थी। आइजोल की उस ऐतिहासिक टीम के सहायक कोच विलियम कोसो थे, जो एएफसी ‘ए’ लाइसेंस हासिल करने वाले नगालैंड के पहले कोच बने।

हालांकि, पिछले सत्र में आइजोल एफसी को भी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। टीम को रेलिगेशन से बचने के लिए आखिरी मुकाबले में शिलांग लाजोंग के खिलाफ कम से कम एक अंक की जरूरत थी। 1-1 से ड्रॉ के बाद उसने लीग में अपनी जगह बरकरार रखी।

इसी पृष्ठभूमि में आइजोल एफसी जून 2026 में ‘फुटबॉल फॉर पीस’ अभियान के तहत नगालैंड पहुंचा। 6 जून को चुमौकेदिमा में नगालैंड यूनाइटेड और आइजोल के बीच ‘मैच फॉर पीस, गोल फॉर होप’ खेला गया।

टिकट की कीमत 20 रुपये रखी गई थी और इससे जुटाई गई रकम एक अनाथालय को दी जानी थी। मुकाबले में आइजोल ने 2-0 से जीत दर्ज की, लेकिन इस आयोजन का उद्देश्य खेल से आगे था।

आइजोल एफसी के मालिक रॉबर्ट आर. रॉयते ने इस अवसर पर कहा कि नगालैंड भी राष्ट्रीय लीग में अपने क्लब का हकदार है। इसके बाद दोनों क्लबों के बीच सहयोग का रास्ता आगे बढ़ा। 9 सितंबर को अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) ने उनके बीच हुए सद्भावना समझौते को मंजूरी दे दी।

समझौते के तहत नगालैंड यूनाइटेड ने इंडियन फुटबॉल लीग में आइजोल एफसी की जगह ली। आइजोल ने नए क्लब को तकनीकी सहयोग और खिलाड़ियों के विकास में मदद देने का वादा किया है।

इस तरह लगातार 11 सत्र राष्ट्रीय लीग में खेलने वाला आइजोल अब मिजोरम प्रीमियर लीग में हिस्सा लेगा, जबकि नगालैंड यूनाइटेड को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता साबित करने का अवसर मिलेगा।

यह बदलाव पूर्वोत्तर के फुटबॉल में एक क्लब से दूसरे क्लब तक अवसर पहुंचाने की मिसाल भी है। आगामी कार्यक्रम में भी दोनों टीमों की कहानी जुड़ी रहेगी।

नगालैंड यूनाइटेड 25 नवंबर को शिलांग में खेलेगा, जहां आइजोल ने अपना ऐतिहासिक लीग खिताब जीता था। इसके बाद 7 दिसंबर को उसका मुकाबला आइजोल में होगा।

स्थानीय खिलाड़ियों को प्राथमिकता

राष्ट्रीय लीग में प्रवेश के बाद नगालैंड यूनाइटेड के सामने सबसे बड़ी चुनौती कम समय में प्रतिस्पर्धी टीम तैयार करने की थी। क्लब ने कोच और सहयोगी स्टाफ की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे, जिनमें अर्जेंटीना, स्पेन और ब्राजील जैसे देशों से भी आवेदन पहुंचे।

इसके बावजूद प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि टीम के गठन में नगालैंड के स्थानीय खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस नीति का उदाहरण घुके चिशी और विनातो आचुमी हैं। 20 वर्षीय केंद्रीय मिडफील्डर घुके और विनातो नगालैंड की अंडर-20 टीमों से आगे बढ़कर अब इंडियन फुटबॉल लीग में खेलने के लिए चुने गए हैं।

17 अक्टूबर को चुमौकेदिमा में एक स्थानीय कार डीलरशिप ने दोनों खिलाड़ियों के सम्मान में छोटा समारोह आयोजित किया। यह आयोजन इस बात का संकेत था कि राष्ट्रीय लीग में क्लब की भागीदारी स्थानीय युवाओं और समुदाय के लिए भी मायने रखती है।

क्लब के समन्वयक जेंटलसन वाशुम ने बताया कि लीग में टीम को 20 मुकाबले खेलने हैं, जिनमें 10 घरेलू मैदान पर होंगे। चुमौकेदिमा में फीफा से मान्यता प्राप्त कृत्रिम टर्फ बिछाने की योजना भी है।

क्लब की कोशिश एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है, जिससे खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलें और नगालैंड फुटबॉल को देश के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिले।

अबू मेथा का कहना है कि मैदान पर उतरने वाली हर टीम का लक्ष्य जीतना होता है। वहीं, नगालैंड फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष के. नेइबू सेखोस ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि राज्य के फुटबॉल सफर की यह अभी शुरुआत है।

श्रीनगर से शुरू होगा नया अध्याय

नगालैंड यूनाइटेड का पहला मुकाबला 30 अक्टूबर को श्रीनगर में रियल कश्मीर से होगा। इसके बाद 14 नवंबर को चुमौकेदिमा में गोकुलम केरल के खिलाफ टीम अपना पहला घरेलू मुकाबला खेलेगी। महीने के अंत में डेम्पो और 19 दिसंबर को मोहम्मडन स्पोर्टिंग जैसी अनुभवी टीमों से उसका सामना होगा।

मोहम्मडन स्पोर्टिंग का मुकाबला विशेष रूप से दिलचस्प होगा, क्योंकि तालिमेरेन आओ ने अपने फुटबॉल करियर में कोलकाता के मोहन बागान की कप्तानी भी की थी। ऐसे में नगालैंड यूनाइटेड का कोलकाता के इस ऐतिहासिक क्लब से भिड़ना अतीत और वर्तमान के बीच एक अनोड़ा जुड़ाव होगा।

इस सत्र में इंडियन फुटबॉल लीग होम-एंड-अवे प्रारूप में खेली जाएगी। इससे नगालैंड यूनाइटेड को अपने घरेलू मैदान पर समर्थकों के सामने खेलने के साथ देश के अलग-अलग शहरों में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलेगा।

क्लब ने दूसरे राज्यों में रहने वाले नागा समुदाय के लोगों, खासकर विद्यार्थियों से भी अपील की है कि वे अपनी टीम के मुकाबले देखने स्टेडियम पहुंचें।

श्रीनगर की ठंडी शाम में होने वाला उद्घाटन मुकाबला इसलिए भी खास होगा, क्योंकि मैदान पर उतरने वाली दोनों टीमों की पृष्ठभूमि अलग है। एक ओर कश्मीर का स्थापित क्लब होगा, तो दूसरी ओर नागा पहाड़ियों से आया ऐसा दल, जिसने बेहद कम समय में स्थानीय प्रतियोगिताओं से राष्ट्रीय लीग तक का सफर तय किया है।

नगालैंड में फुटबॉल सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है। यह गांवों, युवाओं और समुदायों को जोड़ने वाला खेल है। अब इस जुड़ाव को राष्ट्रीय मंच मिल रहा है।

चुमौकेदिमा के मैदान से शुरू हुआ नगालैंड यूनाइटेड का सफर श्रीनगर तक पहुंच चुका है। आगे उसे देश के स्थापित क्लबों के खिलाफ अपनी क्षमता साबित करनी होगी, स्थानीय प्रतिभाओं को निखारना होगा और अपने राज्य की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा।

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तालिमेरेन आओ ने जिस दौर में सीमित संसाधनों के बीच फुटबॉल खेलते हुए भारत की कप्तानी की थी, उस समय राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना नगालैंड के खिलाड़ियों के लिए दूर का सपना था।

अब उसी राज्य का एक क्लब इंडियन फुटबॉल लीग में अपना पहला कदम रखने जा रहा है। यह उपलब्धि केवल एक टीम की नहीं, बल्कि उस फुटबॉल संस्कृति की भी है, जिसने दशकों तक सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के प्रति अपना जुनून बनाए रखा।

30 अक्टूबर को पहली सीटी बजने के साथ नगालैंड यूनाइटेड के लिए एक नया अध्याय शुरू होगा। उसके सामने चुनौती बड़ी है, लेकिन राष्ट्रीय लीग तक पहुंचना अपने आप में उस लंबे इंतजार का जवाब है। अब देखना होगा कि यह नई टीम भारतीय फुटबॉल में अपनी पहचान कितनी मजबूती से स्थापित कर पाती है।

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