AI, साइबर फॉरेंसिक और कानून के संगम से मजबूत होगी न्याय व्यवस्था

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हाईलाइट्स

  • UPSIFS में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘टेक संगम 2026’ शुरू
  • भारत-अमेरिका सहयोग, डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर चर्चा 
  • डेटा सुरक्षा और फॉरेंसिक विज्ञान में AI की भूमिका पर मंथन

लखनऊ। उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (UPSIFS), लखनऊ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर फॉरेंसिक, क्वांटम डेटा प्रोटेक्शन और कानूनी अनुपालन के बीच समन्वय को लेकर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘टेक संगम 2026’ का शुभारंभ हुआ।

मंथन सभागार में आयोजित उद्घाटन समारोह में संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जी. के. गोस्वामी, यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलिस (अमेरिका) की अध्यक्ष प्रो. तनुजा सिंह, आईआईएम शिलांग के निदेशक प्रो. ए. एम. शैरी, प्रो. नागरत्ना, पवन शर्मा और संजीव सुमन सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर सम्मेलन की शुरुआत की।

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने तेजी से बदलती तकनीक के दौर में डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता, साइबर अपराधों की जांच, डेटा सुरक्षा, वैज्ञानिक नैतिकता और न्यायिक प्रक्रिया में तकनीकी नवाचारों के प्रभावी इस्तेमाल पर विचार रखे।

वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी दक्षता के साथ कानूनी समझ और नैतिक जिम्मेदारी का समन्वय ही भविष्य की न्याय व्यवस्था को अधिक सक्षम बना सकता है।

वैश्विक सहयोग से फॉरेंसिक विज्ञान और न्याय को मिलेगी नई दिशा

यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलिस की अध्यक्ष प्रो. तनुजा सिंह ने भारत-अमेरिका सहयोग और वैज्ञानिक नैतिकता के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान पूरी मानवता की साझा संपदा है और इसे राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। फॉरेंसिक विज्ञान और न्याय के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग से नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

उन्होंने कानूनी शिक्षा को वैज्ञानिक ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव से जोड़ने के लिए UPSIFS के प्रयासों की सराहना की। अमेरिका में फॉरेंसिक पहचान से जुड़ी परियोजना का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि फॉरेंसिक विज्ञान का महत्व केवल न्याय सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और जरूरतों की पूर्ति में भी अहम भूमिका निभाता है।

प्रो. सिंह ने कहा कि DNA और AI जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच नैतिक विवेक और निष्पक्ष मानवीय निर्णय क्षमता को बनाए रखना जरूरी है। न्याय को किसी सॉफ्टवेयर की तरह डाउनलोड नहीं किया जा सकता, इसलिए तकनीकी प्रणालियों के साथ मानवीय समझ और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

सिर्फ डिग्री नहीं, व्यावहारिक कौशल और नैतिक मूल्यों पर भी जोर

आईआईएम शिलांग के निदेशक प्रो. ए. एम. शैरी ने उच्च शिक्षा में व्यावहारिक कौशल, मजबूत बुनियादी ज्ञान और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना भी जरूरी है।

पायथन प्रोग्रामिंग और क्वांटम मैकेनिक्स का उदाहरण देते हुए उन्होंने विषयों के मूल सिद्धांतों को समझने पर जोर दिया। उबर, जोमैटो, स्विगी और अमेजन जैसी कंपनियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समझाया कि वास्तविक जीवन की समस्याओं को पहचानना और उनके व्यावहारिक समाधान तलाशना ही नवाचार और उद्यमशीलता का आधार है।

तकनीक और कानून का तालमेल आधुनिक न्याय की कुंजी

सम्मेलन में संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जी. के. गोस्वामी ने अतिथियों, विशेषज्ञों और विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने ‘टेक संगम 2026’ को संस्थान की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुए कहा कि तकनीक और कानून का समन्वय आधुनिक न्याय व्यवस्था की प्रमुख जरूरत है।

यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलिस की अध्यक्ष प्रो. तनुजा सिंह का विशेष स्वागत करते हुए उन्होंने दोनों संस्थानों के बीच साझेदारी को द्विपक्षीय संबंधों और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने विश्वास जताया कि सम्मेलन में होने वाला विचार-विमर्श विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साबित होगा और उन्हें उभरती तकनीकों तथा उनके कानूनी पहलुओं की बेहतर समझ प्रदान करेगा।

वैज्ञानिक जांच को मजबूत करने में आधुनिक तकनीकों की अहम भूमिका

मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी ने अपने संबोधन में प्रदेश की सुरक्षा और वैज्ञानिक जांच व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का उल्लेख किया। उन्होंने प्रदेश में 18 फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं, DNA परीक्षण और गैस क्रोमैटोग्राफी जैसी आधुनिक तकनीकों की भूमिका को रेखांकित किया।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तकनीकी दृष्टिकोण और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वैज्ञानिक विषयों में रुचि के साथ अपराध अनुसंधान को मजबूत करने के प्रयासों की सराहना की।

अवस्थी ने उम्मीद जताई कि सम्मेलन के दौरान तीन दिनों तक विशेषज्ञों के बीच होने वाला विचार-विमर्श प्रदेश में तकनीक के इस्तेमाल को और बढ़ावा देने में उपयोगी साबित होगा।

‘लीगल-बाय-डिजाइन’ तकनीक विकसित करने की जरूरत

आईआईटीएम सी-डॉट समज्ञा टेक्नोलॉजीज फाउंडेशन की सीईओ प्रो. नागरत्ना ने डिजिटल युग में कानून, तकनीक और फॉरेंसिक विज्ञान के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचार या ISO प्रमाणन मात्र से किसी तकनीक की उपयोगिता सुनिश्चित नहीं होती। नई तकनीकों को शुरुआत से ही कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना जरूरी है। इसी दृष्टिकोण को ‘लीगल-बाय-डिजाइन’ कहा जाता है।

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उन्होंने अदालतों में डिजिटल साक्ष्यों की वैधता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए फॉरेंसिक एल्गोरिदम के मानकीकरण तथा मेटाडेटा की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताया।

उनके अनुसार, तकनीकी विशेषज्ञों को कानूनी बारीकियों और कानूनी विशेषज्ञों को तकनीक के फॉरेंसिक पहलुओं की समझ होनी चाहिए। दोनों क्षेत्रों के बीच इस तालमेल के बिना डिजिटल अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण मुश्किल होगा।

प्रो. नागरत्ना ने उच्च शिक्षा में ‘लॉ विद लैब्स’ की अवधारणा को शामिल करने और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को साझा प्रशिक्षण देने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और जनविश्वास बनाए रखने के लिए तकनीक और कानून के बीच समन्वय निर्णायक साबित होगा।

AI से लेकर क्वांटम डेटा सुरक्षा तक विभिन्न विषयों पर चर्चा

सम्मेलन के दौरान डेटा प्रोटेक्शन और डिजिटल ट्रस्ट, क्वांटम तकनीक का भविष्य, रोजगार के नए अवसर, लीगल-टेक्नो प्रोफेशन, फॉरेंसिक विज्ञान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उभरती प्रौद्योगिकियों के प्रभाव पर विभिन्न सत्र आयोजित किए गए।

इनमें फॉरेंसिक विज्ञान में AI का इस्तेमाल, रोबोटिक्स, ड्रोन और 3D प्रिंटिंग, युवा पेशेवरों को इंडस्ट्री-रेडी बनाना, साइबर रेजिलिएंस, बैंकिंग एवं बीमा क्षेत्र में कानूनी अनुपालन, निर्माण क्षेत्र में AI तथा डेटा प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क जैसे विषय शामिल रहे।

विशेषज्ञों और पैनलिस्टों ने तकनीकी, कानूनी, फॉरेंसिक और शैक्षणिक क्षेत्रों की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए व्यावहारिक समाधान और भविष्य की संभावनाओं पर विचार रखे।

विभिन्न सत्रों में DIG आशीष तिवारी, प्रमुख सचिव पंधारी यादव (IAS), पवन शर्मा (PoP, UPSIFS), अंजलि गुप्ता, पराग शेंडे, पांडुरंग आचार्य, वैभव प्रताप सिंह, अतुल त्रिपाठी, डॉ. विदुर राज, डॉ. शेखर शुक्ला, चंद्रशेखर मिश्रा, रवींद्र बर्लिंगे, डॉ. रंजीत सिंह, दिलीप चौहान, प्रो. अश्वनी कुमार,

मिलिंद राज, आदित्य वधोकर, हेवन पांड्या, कौस्तुभ त्रिपाठी, अनुपम सरन, अतुल मिश्रा, उपेंद्र गिरि, मुकेश सिंह, गुंजन मिश्रा, आलोक कुमार, मनोज मधुसूदनन, सुनील चेरियन कोरह,

पंकज श्रीवास्तव, डॉ. कुंज टंडन, सत्यम कुशवाहा, डॉ. सुभाष रस्तोगी, मनोरंजन मिश्रा और रश्मिल मोहन सहित अन्य विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। TCS, Zscaler और QNu Labs के उद्योग प्रतिनिधियों ने भी विभिन्न सत्रों में भाग लेकर मार्गदर्शन प्रदान किया।

कार्यक्रम में अपर निदेशक संजीव सुमन, चिरंजीब मुखर्जी, अतुल यादव, संस्थान के फैकल्टी सदस्य डॉ. सेंथिल सुब्रमण्यम, डॉ. पोरावी सिंह, तान्या सिंह, डॉ. श्रुतिदास गुप्ता, डॉ. सपना शर्मा, डॉ. प्रीति मलिक, डॉ. अशित श्रीवास्तव और जनसंपर्क अधिकारी संतोष तिवारी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

तीन दिवसीय ‘टेक संगम 2026’ का उद्देश्य तकनीकी विशेषज्ञों, कानूनविदों, फॉरेंसिक वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों को एक साझा मंच पर लाकर उभरती तकनीकों के जिम्मेदार इस्तेमाल, डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श करना है।

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