आज दिनाङ्क 6 जून को प्रख्यात विद्वान्, शिक्षाविद् महाकवि, प्रवचनकार, दार्शनिकधर्मगुरु, रामानन्द सम्प्रदाय के वर्तमान चार जगद्गुरु रामानन्दाचार्यों में से एक जगद्गुरुश्रीरामभद्राचार्य श्रीतुलसीपीठाधीश्वर, आजीवनकुलाधिपति, जगद्गुरुरामभद्राचार्य दिव्याङ्गराज्यविश्वविद्यालय का अभिनन्दन समारोह सम्पन्न हुआ।
ज्ञानपीठ,पद्मविभूषण आदि शताधिकसर्वोच्च सम्मानों से विभूषित आशु महाकविज ग्दगुरुरामानन्दाचार्य स्वामि श्री रामभद्राचार्य महिराज ने तीन सौ से अधिक ग्रन्थों का प्रणयन करके शंकराचार्यों की भाति प्रस्थात्रयी सहित एकादश उपनिष्दों सहित अनेक भाष्यों का प्रणयन किया इन्होने अभिनवराघव नामक भाष्यों का प्रणयन करके इन्होने सम्पूर्ण भारतवर्ष मे भारतीय धर्म एवं संस्कृति का डिण्डिम घोष किया।
इन्होने सनातनधर्म तथा भारतीय वैदिक संस्कृत मे सामञ्जस्य स्थापित करने के उद्देश्य से भारत वर्ष तथा भक्त की विशिष्ट व्याख्या की। भारतवर्ष की भक्ति करने वाला ही भक्त तथा भारतीय हो सकता है।
मुख्यवक्ता के रूप सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति के महत्त्व को उद्घाटित करते हुए जगद्गुरु नें कहा कि आवश्यक है कि नई पीढ़ी को सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति के मूल्यों से परिचित कराया जाए, जिससे भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का संरक्षण एवं संवर्धन हो सके। यही सामंजस्य भारत को विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर करता है।
सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति भारतीय सभ्यता की अमूल्य और अक्षुण्ण धरोहर हैं, इसमें मानव कल्याण, नैतिक मूल्यों तथा विश्वबंधुत्व की भावना का पूरी तरह समावेश किया गया है। वैदिक संस्कृति ने मानव जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलित मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की है।
सनातन धर्म के मूल सिद्धांत सत्य, अहिंसा, करुणा, सहिष्णुता एवं प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को प्रोत्साहित करते हैं। प्रकृति के संरक्षण की बहुत आवश्यकता है। क्यों कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो मानव का अस्तित्व भी बचा रहेगा।
भारतीय वैदिक संस्कृति और सनातन धर्म का सामंजस्य समाज में सद्भाव, नैतिकता एवं आध्यात्मिक चेतना का विकास करता है। वेद, उपनिषद, पुराण तथा अन्य धर्मग्रंथ मानव जीवन को उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वर्तमान समय में भी इन आदर्शों की प्रासंगिकता बनी हुई है, क्योंकि ये पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता तथा वैश्विक शांति का संदेश देते हैं।
कार्यक्रम मे जगद्गुरामभद्राचार्य के साथ उनके परम शिष्य श्रीरामचन्द्राचार्य नें भी कार्यक्रम अपने वक्तव्य से विशिष्ट बनाया। जगद्गुरुरामान्दाचार्यराजस्थानसंस्कृतविश्विद्यालय ,जयपुर के पूर्वकुलपति प्रो.रामसेवकदुबे जी ने जगद्गुरु के भाष्यों के अप्रतिम वैशिष्ट्यों पर सोद्धरण प्रकाश डाला। लखनऊ के परमयशस्वी विधायक मा.नीरजबोरा जी की विशेष उपस्थिति श्लाघ्य है।विधायक जी ने अखिल भारतीय संस्कृत के पुस्तकालय आदि के विकास हेतु पांच लाख रु.विधायक निधि से देने की घोषणि करके कृपा की।।
जगद्गुरुरामभद्राचार्य ने भी तुलसीपीठाधीश्वर के रूप मे एकलाख रु.परिषद् के विकास हेतु दान करनी की घोषणा की.।कार्यक्रम में जगद्गुरामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिशिर कुमारपाण्डेय और अध्यक्ष डा. चन्द्रभूषण त्रिपाठी, परिषद् के उपाध्यक्ष डा. रवि किशोर त्रिवेदी, कोषाध्यक्ष डा.युग्गीलालदीक्षित,सेवानिवृत्त अधीक्षक,जिला कारागार, कानपुर नगर डा. बिधुदत्त पाण्डेय ने कार्यक्रम में यथायोग्य सहयोग करके गरिमा बढाई।
मान् चिकित्सक डा.सूर्यकान्तत्रिपाठी,डा.अनिलकुमार शुक्ल,सचिव आवासविकास,आई ए एस,डा.आशुतोष द्विवेदी,प्रमोदपण्डित,क्षेत्रीयप्रचारक,संस्कृतभारती,प्रो.हरिशंकर मिश्र,प्रो.रामसुमेरयादव ,डा.चन्द्रकान्तद्विवेदी, तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृतविभागीय आचार्य प्रो.अनिलप्रतापगिरि जी सहित सहस्राधिक संस्कृतानुरागी आयोजन मे उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् के मन्त्री प्रो.प्रयाग नारायण मिश्र ने संस्था का परिचय तथा अध्यक्ष डा.चन्द्रभूषणत्रिपाठी ने जगद्गुरुश्रीरामभद्राचार्य का अभिनन्दन पत्र को सबके सम्मुख रखा। आज के कार्यक्रम में जुहारी देवी पी.जी.कालेज,कानपुर की पूर्वप्राचार्या डा.रेखाशुक्ला उपस्थित रहीं।
इसके अतिरिक्त संस्कृत विभाग,ल.वि.वि के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो.अभिमन्यु सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामसुमेर यादव, , डा. शोभा राम दुबे, डा.रागिनी श्रीवास्तव, डा. शालिनी साहनी डा.सरिता सिंह, डा. घनश्याम पाल, डा.कुसुम सिंह, हैदर गढ की डा.नीलमपाण्डेय, आशीष, रंजना निखिल, सौरभ आदि की विशेष उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद् के अध्यक्ष डा चन्द्रभूषण त्रिपाठी नें वैदिक संस्कृति वैशिष्ट्य पर विशेष प्रकाश डाला । आज के कार्यक्रम का सञ्चालन अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् के सम्मानित सदस्य प्रो. अशोक कुमार शतपथी ने किया। इस कार्यक्रम में वैदिक मङ्गलाचरण कुलवंत द्वारा किया गया।
शान्तिपाठ भी कुलवंत आदि समवेत स्वर में किया गया। आयोजन में अनेक विद्वान् तथा ज्योतिष और संस्कृतविभाग,ल.वि.वि तथा केन्द्रीयसंस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के शोधच्छात्रों सहित सौ से अधिक श्रोता उपस्थित रहे।













