लखनऊ। सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि फोरेंसिक विज्ञान केवल एक वैज्ञानिक विषय नहीं, बल्कि विधि विज्ञान, तकनीक और मानवीय विवेक का संगम है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि सत्य और न्याय के प्रहरी बनकर समाज की सेवा करें।
डॉ. राजेश्वर सिंह उत्तर प्रदेश राज्य फोरेंसिक विज्ञान संस्थान (UPSIFS), औरावां-दरोगा खेड़ा, बंथरा में आयोजित “नवारंभ-2026” के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
कार्यक्रम में समाज कल्याण विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण, यूपीएसआईएफएस के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी, प्रमुख सचिव (श्रम) केएमएस सुंदरम (आईएएस), डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अमरपाल सिंह सहित संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, अभिभावक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में डॉ. राजेश्वर सिंह ने फ्रांसीसी अपराधशास्त्री एडमंड लोकार्ड के प्रसिद्ध सिद्धांत “प्रत्येक संपर्क एक चिह्न छोड़ता है” का उल्लेख करते हुए कहा कि डीएनए प्रोफाइलिंग, फिंगरप्रिंट विज्ञान, बैलिस्टिक्स, विष विज्ञान और साइबर फोरेंसिक आज न्याय व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में विश्व का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो वर्ष 1897 में कोलकाता में स्थापित हुआ था, जबकि आधुनिक डीएनए प्रोफाइलिंग तकनीक ने अपराधों की जांच को नई दिशा दी है।
उन्होंने साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि गृह मंत्रालय के सी-14 पोर्टल पर वर्ष 2024 से 2026 के बीच लगभग 53 लाख साइबर धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से करीब 1.80 लाख शिकायतें एफआईआर में परिवर्तित हुईं और इनसे जुड़ी लगभग 56 हजार करोड़ रुपये की धनराशि प्रभावित हुई।
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उन्होंने बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने 30 जून 2026 तक 32.80 लाख शिकायतों में कार्रवाई करते हुए लगभग 11,158 करोड़ रुपये की राशि बचाई है।
साथ ही संदिग्ध रजिस्ट्री के माध्यम से 18.43 लाख संदिग्ध पहचानकर्ताओं और 24.67 लाख म्यूल बैंक खातों की पहचान कर 8,031.56 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन रोके गए तथा 16,840 आरोपितों की गिरफ्तारी सुनिश्चित हुई।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के बाद सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फोरेंसिक परीक्षण अनिवार्य हो गया है।
इसके चलते देशभर में प्रतिवर्ष लगभग छह लाख और उत्तर प्रदेश में 72 हजार से 90 हजार मामलों में फोरेंसिक जांच की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि इससे प्रशिक्षित फोरेंसिक विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ेगी और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे।
उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की क्राइम इन इंडिया-2024 रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2024 में देश में 58.86 लाख संज्ञेय अपराध दर्ज हुए, जिनमें से लगभग 4.5 से 6 लाख मामले ऐसे हैं जिनमें सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।
वहीं देश में वर्तमान में केवल सात केंद्रीय डिजिटल फोरेंसिक प्रयोगशालाएं और 24 राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं, जबकि स्वीकृत 3,211 पदों में से लगभग 40 प्रतिशत रिक्त हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति फोरेंसिक विशेषज्ञों की बढ़ती आवश्यकता को स्पष्ट करती है।
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विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने चार मूल मंत्र दिए- सत्यनिष्ठा, शुद्धता एवं सटीकता, निरंतर अध्ययन और संवेदनशीलता। उन्होंने कहा कि एक फोरेंसिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट किसी भी मामले की दिशा और न्याय की गति तय कर सकती है, इसलिए इस क्षेत्र में व्यावसायिक ईमानदारी और जिम्मेदारी सर्वोपरि है।
इस अवसर पर डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने पिता स्वर्गीय आर.बी. सिंह की स्मृति में एक विशेष पुरस्कार की घोषणा भी की। उन्होंने बताया कि आगामी शैक्षणिक सत्र से संस्थान के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी को प्रतिवर्ष एक लाख रुपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।
समारोह के अंत में उन्होंने यूपीएसआईएफएस के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी और उनकी पूरी टीम को संस्थान की स्थापना एवं विकास के लिए बधाई दी तथा सरोजनीनगर विधायक के रूप में संस्थान को हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।













