जलवायु अनुकूल खेती, जल और ऊर्जा सुरक्षा पर लखनऊ में मंथन

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लखनऊ। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने, कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में जल एवं ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों पर विचार-विमर्श के लिए मंगलवार को लखनऊ में दो दिवसीय क्षेत्रीय ग्रामीण भारत शिखर सम्मेलन शुरू हुआ।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT कानपुर) ने पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज और पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन के शमन एवं अनुकूलन के लिए पुनर्योजी कृषि, जल और ऊर्जा विषय पर इस सम्मेलन का आयोजन किया है।

IIT कानपुर और पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजन

सम्मेलन का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने मुख्य अतिथि के रूप में किया। उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार एवं कृषि निर्यात विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह और सहकारिता विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयेंद्र प्रताप सिंह राठौर विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

इस अवसर पर पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष प्रो. जोआखिम वॉन ब्राउन, IIT कानपुर के निदेशक प्रो. मनींद्र अग्रवाल और कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. सच्चिदा नंद त्रिपाठी भी उपस्थित रहे।

दो दिवसीय ग्रामीण भारत शिखर सम्मेलन शुरू, सूर्य प्रताप शाही ने किया उद्घाटन

दो दिवसीय सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों और कृषि विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता विकसित करने और सतत ग्रामीण विकास के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। इसमें विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की कृषि संबंधी प्राथमिकताओं और चुनौतियों को केंद्र में रखा गया।

कृषि प्रणालियों को मजबूत बनाने, जल संसाधनों का संरक्षण करने और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप ग्रामीण समुदायों को तैयार करने के उपायों पर मंथन हुआ।

कृषि विविधीकरण और आधुनिक तकनीक अपनाने पर जोर

उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार एवं कृषि निर्यात विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि IIT कानपुर की यह पहल नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

सम्मेलन की सफलता इसी बात में है कि यहां होने वाली चर्चाओं को ऐसे व्यावहारिक समाधानों में बदला जाए, जिनका सीधा लाभ किसानों को मिले और प्रदेश की समृद्धि में योगदान हो।

उन्होंने कहा कि कृषि जोतों का आकार लगातार घट रहा है और खेती से जुड़ी मांगें बढ़ रही हैं। ऐसे में पारंपरिक खेती के तरीकों से आगे बढ़कर वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और कृषि विविधीकरण को अपनाना जरूरी है।

बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और बेहतर बाजार संपर्क किसानों की आय बढ़ाने के साथ सीमित भूमि से अधिक लाभ प्राप्त करने के अवसर प्रदान करते हैं।

जलवायु अनुकूल विकास के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान जरूरी

सहकारिता विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयेंद्र प्रताप सिंह राठौर ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए वैज्ञानिक विशेषज्ञता, अनुसंधान और नीतिगत दृष्टिकोणों को एक मंच पर लाना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अलग-अलग क्षेत्रों की कृषि और जल संबंधी चुनौतियां भी अलग हैं। इसलिए क्षेत्र विशेष के अनुरूप समाधान तलाशने होंगे।

उन्होंने टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने, मिट्टी और जल संसाधनों के संरक्षण तथा स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल पर जोर दिया। कहा कि विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार पर्यावरण संरक्षण के साथ होना चाहिए। वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचारों के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है।

किसानों तक पहुंचे वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ

IIT कानपुर के निदेशक प्रो. मनींद्र अग्रवाल ने कहा कि देश के पास उपजाऊ भूमि का वरदान है, लेकिन कृषि क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कृषि जोतों का लगातार छोटा होना, जल संसाधनों का घटता स्तर और फसलों में कीट एवं बीमारियों का प्रबंधन प्रमुख हैं। इनका सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज और पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के साथ साझेदारी इन चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक और जमीनी समाधानों में बदलना है, ताकि विशेष रूप से वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों के किसानों को लाभ मिल सके और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो।

IIT कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. सच्चिदा नंद त्रिपाठी ने कहा कि गंगा का मैदानी क्षेत्र देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। हालांकि, यह क्षेत्र मिट्टी के घटते स्वास्थ्य, भूजल के अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता और ऊर्जा की बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।

उन्होंने कहा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए एकीकृत, विज्ञान आधारित और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले उपायों की जरूरत है।

सम्मेलन के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान, नीतिगत दृष्टिकोण, पारंपरिक अनुभवों और सामुदायिक प्रयासों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें युवाओं और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।

पुनर्योजी कृषि और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की जरूरत

पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष प्रो. जोआखिम वॉन ब्राउन ने कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए स्थानीय और वैश्विक स्तर पर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

इसके लिए विज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान को अधिक समर्थन दिया जाना चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश में किसानों को प्रोत्साहित कर पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा, विशेष रूप से सौर ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कृषि और सौर ऊर्जा के संयुक्त उपयोग यानी एग्रीवोल्टिक्स को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही खुले वातावरण में काम करने वाले श्रमिकों को अत्यधिक गर्मी और लू से बचाने के उपाय करना भी जरूरी है।

मानसून की अनिश्चितता और मिट्टी के स्वास्थ्य पर चर्चा

सम्मेलन के पहले दिन मानसून की अनिश्चितता और उसके कृषि प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विशेष चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि उत्तर प्रदेश में खेती और ग्रामीण आजीविका काफी हद तक वर्षा के स्वरूप पर निर्भर करती है।

मानसून के आगमन और वर्षा के वितरण में बदलाव का असर बुवाई, सिंचाई और फसल उत्पादन पर पड़ता है। इस संदर्भ में जलवायु मॉडलिंग, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और कृषि नियोजन में मौसम संबंधी जानकारियों के उपयोग की जरूरत बताई गई।

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पुनर्योजी कृषि से जुड़े सत्र में मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, उसकी जल धारण क्षमता बढ़ाने और भूजल पुनर्भरण को प्रोत्साहित करने पर विचार किया गया। कृषि, मृदा विज्ञान, जल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों ने ऐसी खेती पद्धतियों पर चर्चा की, जो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए कृषि उत्पादकता बनाए रखने में मददगार हों।

बुंदेलखंड और गंगा बेसिन की चुनौतियों पर मंथन

जलवायु अनुकूल कृषि और ग्रामीण विकास में स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर आयोजित सत्र में बुंदेलखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और गंगा बेसिन की क्षेत्रीय चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें बांदा में मेड़बंदी, तालाबों और सोख्ता गड्ढों के माध्यम से भूजल पुनर्स्थापन तथा गंगा बेसिन में जल एवं भूमि प्रबंधन के एकीकृत उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।

विशेषज्ञों ने बढ़ते ताप तनाव से निपटने, जल संरक्षण और किसानों को कृषि विविधीकरण के लिए प्रोत्साहित करने में जिला प्रशासन एवं स्थानीय निकायों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।

चर्चा में जलवायु परिवर्तन और जनस्वास्थ्य का संबंध भी 

सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन और जनस्वास्थ्य के बीच संबंधों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने अत्यधिक गर्मी, वायु गुणवत्ता में गिरावट और जल से जुड़ी मौसमी घटनाओं के कारण पैदा होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जलवायु अनुकूलन की योजनाओं में कृषि और जल सुरक्षा के साथ जनस्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

कई देशों में हो चुके हैं ऐसे सम्मेलन

क्षेत्रीय ग्रामीण भारत शिखर सम्मेलन का आयोजन IIT कानपुर, पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज और पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।

इस सम्मेलन श्रृंखला के आयोजन इससे पहले अमेरिका, केन्या, ऑस्ट्रिया, ब्राजील और सेनेगल में हो चुके हैं। लखनऊ में आयोजित सम्मेलन में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की प्राथमिकताओं और चुनौतियों को केंद्र में रखकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक अनुभवों और संभावित समाधानों पर चर्चा की जा रही है।

सम्मेलन का समन्वय IIT कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के माध्यम से किया जा रहा है। दूसरे दिन भी जलवायु परिवर्तन के शमन एवं अनुकूलन, ग्रामीण क्षेत्रों की सहनशीलता और टिकाऊ विकास के लिए व्यावहारिक रणनीतियों पर विचार-विमर्श जारी रहेगा।

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