लखनऊ: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर ने पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज (पीएएस) और पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज (पीएएसएस), वेटिकन सिटी के सहयोग से 3 और 4 नवंबर को लखनऊ में आयोजित क्षेत्रीय ग्रामीण-भारत शिखर सम्मेलन का सफ़लतापूर्वक समापन किया।
उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही मुख्य अतिथि तथा दिनेश प्रताप सिंह और जयेंद्र प्रताप सिंह राठौर विशेष अतिथि के रूप में हुए शामिल
‘जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और उनसे निपटने के लिए मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि, जल और ऊर्जा’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन का संचालन आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ़ सस्टेनेबिलिटी के तत्वाधान में किया गया।

इस स्कूल की स्थापना कोटक महिंद्रा बैंक के सहयोग से हुई है। सम्मेलन में भारत और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने, मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के सतत विकास के उपायों पर चर्चा की गई।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वहीं, उद्यान, कृषि एवं विपणन विभाग के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह और सहकारिता विभाग के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री जयेंद्र प्रताप सिंह राठौर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
इस सत्र में आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल, पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज के अध्यक्ष प्रो. जोआचिम वॉन ब्रौन (Prof. Joachim von Braun) और आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ़ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रोफ़ेसर सच्चिदा नंद त्रिपाठी भी शामिल हुए।
आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ़ सस्टेनेबिलिटी के डीन और सम्मेलन के अध्यक्ष प्रो. सच्चिदा नंद त्रिपाठी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए व्यवस्था, व्यापक स्तर और तेजी पर केंद्रित समन्वित प्रयासों की ज़रुरत है। इस चुनौती से निपटने के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीतियों का समन्वित उपयोग करते हुए दीर्घकालिक एवं टिकाऊ समाधान विकसित करना तथा उन्हें प्रभावी ढंग से धरातल पर उतारना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज और पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज के साथ सहयोग से वैश्विक वैज्ञानिक और नीतिगत अनुभवों को क्षेत्रीय जरूरतों से जोड़ने में मदद मिली है।
सम्मेलन ने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों को इन मुद्दों पर विचार-विमर्श का साझा मंच दिया। सम्मेलन में तैयार की गई संयुक्त घोषणा के माध्यम से ग्लोबल साउथ के देशों में जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता मजबूत करने के लिए सामूहिक सुझावों और प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाया जाएगा।
पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज के अध्यक्ष प्रो. जोआचिम वॉन ब्रौन (Prof. Joachim von Braun) ने कहा कि पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने, जल संसाधनों के सतत एवं प्रभावी प्रबंधन तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और आपसी सहयोग के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान को धरातल पर प्रभावी एवं व्यावहारिक समाधानों में परिवर्तित किया जा सकता है। यह सम्मेलन जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों में भारत की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सम्मेलन के पहले दिन जलवायु विज्ञान, कृषि और जनस्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की चुनौतियों पर चर्चा की।
आगामी सत्रों में मानसून के बदलते स्वरूप और कृषि नियोजन पर इसके प्रभाव, पुनर्योजी कृषि तथा जनस्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के असर जैसे विषय शामिल रहे। इस दौरान डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, प्रोफ़ेसर अशोक गुलाटी और डॉ. राजेंद्र सिंह की ख़ास परिचर्चा आकर्षण का केंद्र रही। चर्चा में छोटे और सीमांत किसानों की चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया गया।
भारत के कुल कृषक समुदाय में इनकी हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2050 तक वर्षा आधारित धान और गेहूं की पैदावार में क्रमशः 20 और 19 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों ने मिट्टी की गुणवत्त्ता सुधारने के लिए मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि पद्धतियां अपनाने, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देने तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की जरूरत पर भी ज़ोर दिया।
अन्य सत्रों में जलवायु परिवर्तन के अनुसार खुद को ढालने में स्थानीय नेतृत्व और जिला प्रशासन की भूमिका पर चर्चा हुई। प्रोफ़ेसर ओरजान गुस्ताफ़सन (Prof. Örjan Gustafsson), डॉ. आशीष झा और डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े बढ़ते जनस्वास्थ्य जोखिमों पर अपने विचार रखे। उन्होंने विशेष रूप से अत्यधिक गर्मी, वायु गुणवत्ता में गिरावट और पानी की कमी से समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किया।
सम्मेलन के दूसरे दिन इस बात पर चर्चा हुई कि समुदायों की भागीदारी से चलने वाली पहल, वैज्ञानिक अनुसंधान और नीतियां मिलकर ग्रामीण भारत में जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को कैसे मजबूत कर सकती हैं।
दिन की शुरुआत जलवायु परिवर्तन से निपटने और वैश्विक धार्मिक संस्थाओं की पहल पर चर्चा से हुई। इसमें पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज और पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज के चांसलर कार्डिनल पीटर टर्कसन शामिल हुए।
इस मौके पर सद्गुरु का वीडियो संदेश भी प्रस्तुत किया गया। इसके बाद स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने, पारंपरिक ज्ञान, समुदाय आधारित उपायों और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पलायन पर चर्चा हुई। इन सत्रों में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के पूर्व महानिदेशक डॉ. अजय माथुर और सेवा की रीमा नानावटी सहित अन्य विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में विज्ञान और नीति के बीच बेहतर समन्वय के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की भावी रणनीतियों पर भी एक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें युवाओं की भागीदारी से हुई परिचर्चा में उत्तर प्रदेश से जुड़ी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें पानी की कमी, अत्यधिक गर्मी, मिट्टी की गुणवत्ता और डिजिटल माध्यमों से किसानों तक कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाने जैसे मुद्दे शामिल रहे। चर्चा में ज़मीनी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के उदाहरण भी प्रस्तुत किये गए।
मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि से जुड़ी पहलों के माध्यम से 5,000 एकड़ क्षेत्र में 8,000 से भी ज़्यादा किसानों तक पहुंच बनाई गई है। वहीं, आंकड़ों पर आधारित सिंचाई समाधानों से 150 खेतों में करीब 1.3 करोड़ लीटर भूजल बचाने में मदद मिली है।
सम्मेलन का समापन सत्र पोंटिफ़िकल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर जोआचिम वॉन ब्रौन (Prof. Joachim von Braun) और आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ़ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रोफ़ेसर सच्चिदा नंद त्रिपाठी की उपस्थिति में हुआ। इस दौरान सम्मेलन में हुई चर्चाओं की समीक्षा की गई और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में आगे की कार्ययोजना पर विचार किया गया।
आईआईटी कानपुर के बारे में
1959 में स्थापित, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त है। विज्ञान और इंजीनियरिंग शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध, आईआईटी कानपुर ने अनुसंधान और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका 1,050 एकड़ का हरा-भरा परिसर शैक्षणिक और अनुसंधान संसाधनों से समृद्ध है।
संस्थान में 21 विभाग, 27 केंद्र, तीन अंतर्विषयी कार्यक्रम और तीन विशेष स्कूल हैं, जो इंजीनियरिंग, विज्ञान, डिजाइन, मानविकी और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को समाहित करते हैं। 580 से अधिक पूर्णकालिक फैकल्टी और 9,500 से अधिक छात्रों के साथ, आईआईटी कानपुर नवाचार, अनुसंधान और समग्र विकास में अग्रणी बना हुआ है।
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