लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार किए गए सेल्स (सेल-बेस्ड थेरेपी) की मदद से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर (पेशाब की नली के सिकुड़ने) का सफल इलाज किया गया है।
लखनऊ स्थित अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में 30 वर्षीय मरीज की यह अत्याधुनिक सर्जरी सफल रही। खास बात यह रही कि मरीज को ऑपरेशन के अगले ही दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
अपोलोमेडिक्स में अत्याधुनिक सेल-आधारित सर्जरी, मरीज अगले दिन ही अस्पताल से डिस्चार्ज
इस उपलब्धि को राज्य में यूरोलॉजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सर्जरी डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल, डॉ. वेद भास्कर और डॉ. शैलेंद्र गुप्ता की टीम ने की।
इस प्रक्रिया में टिश्यू इंजीनियरिंग तकनीक के माध्यम से लैब में तैयार किए गए सेल्स का उपयोग किया गया, जिससे पारंपरिक सर्जरी की तुलना में कम चीरफाड़, कम दर्द और तेजी से रिकवरी संभव हो सकी।
लखनऊ निवासी 30 वर्षीय मरीज तीन सेंटीमीटर लंबे बुलबर यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर से पीड़ित था। आमतौर पर ऐसे मामलों में बक्कल म्यूकोसा ग्राफ्ट यूरेथ्रोप्लास्टी (बीएमजीयू) या एंडोस्कोपिक सर्जरी की जाती है।
पारंपरिक सर्जरी से बचने के लिए चुनी आधुनिक तकनीक
बीएमजीयू में मरीज के मुंह के अंदर से लगभग पांच से छह सेंटीमीटर ऊतक निकालना पड़ता है, जिससे कई सप्ताह तक खाने-पीने में परेशानी हो सकती है।
वहीं एंडोस्कोपिक उपचार में बीमारी दोबारा होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक रहती है। मरीज कम चीरफाड़ वाले आधुनिक विकल्प की तलाश में था। इसके बाद डॉक्टरों ने उसे सेल-आधारित उपचार की सलाह दी।
छोटे से टिशू से तैयार किए गए 50 लाख सेल्स
डॉ. वेद भास्कर ने बताया कि मरीज के गाल के अंदर से केवल 10 मिमी × 5 मिमी आकार का एक छोटा-सा ऊतक लिया गया। उसी समय उस स्थान पर टांके लगा दिए गए, जिससे कोई खुला घाव नहीं रहा और मरीज पहले ही दिन सामान्य भोजन कर सका।
इस ऊतक को विशेष कोल्ड-चेन व्यवस्था के साथ पुणे स्थित एक अत्याधुनिक लैब भेजा गया, जहां टिश्यू इंजीनियरिंग तकनीक के जरिए दो सप्ताह में करीब 50 लाख सेल्स तैयार किए गए। इन सेल्स की उपयोग अवधि 72 घंटे होती है, इसलिए इन्हें पूरी सावधानी के साथ वापस लखनऊ लाया गया।
20 मिनट की प्रक्रिया, तेजी से रिकवरी
तैयार सेल्स को लिक्विड थ्रोम्बिन के साथ मिलाकर एंडोस्कोप की सहायता से यूरिथ्रा के प्रभावित हिस्से पर लगाया गया। इससे पहले उस स्थान को इस प्रकार तैयार किया गया कि सेल्स वहां प्रभावी ढंग से चिपक सकें।
इसके बाद ये सेल्स घाव भरने की प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज करते हैं और दोबारा निशान बनने अथवा नली के फिर से सिकुड़ने की संभावना को कम करते हैं।
अपोलोमेडिक्स अस्पताल के डायरेक्टर एवं हेड, यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट, डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल ने बताया कि पूरी प्रक्रिया मात्र 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है। इसमें शरीर पर कोई बड़ा चीरा नहीं लगाया जाता और मुंह के अंदर भी केवल बेहद छोटा नमूना लिया जाता है।
जहां पारंपरिक ओपन सर्जरी में मरीज को दो से तीन सप्ताह तक कैथेटर रखना पड़ता है, वहीं इस तकनीक में इसे केवल एक सप्ताह बाद हटाया जा सकता है। मरीज की रिकवरी भी काफी तेज होती है और वह अगले ही दिन अस्पताल से घर जा सकता है।
चुनिंदा मरीजों के लिए प्रभावी विकल्प
अपोलोमेडिक्स के एसोसिएट डायरेक्टर, यूरोलॉजी डॉ. वेद भास्कर ने बताया कि पुरुषों में यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर संक्रमण, चोट या पहले हुए उपचार के कारण हो सकता है।
यह तकनीक हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन सही मरीजों में इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है, जो पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर मानी जाती है। साथ ही इसमें दर्द कम होता है और मरीज जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकता है।
मरीजों तक अत्याधुनिक इलाज पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध
अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के एमडी एवं सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने कहा कि अस्पताल हमेशा मरीजों तक विश्वस्तरीय और अत्याधुनिक उपचार पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध रहा है।
उन्होंने कहा कि लैब में तैयार सेल्स पर आधारित यह तकनीक कम चीरफाड़ वाले उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिससे मरीजों को कम दर्द, तेजी से रिकवरी और बेहतर जीवन गुणवत्ता का लाभ मिलेगा।
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