डूरंड कप में डायमंड सिंह की दस्तक, मणिपुर के 16 वर्षीय सितारे की कहानी

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रांची में दर्शक पहले ही सब कुछ देख चुके थे। एससी दिल्ली के लिए अपना पहला मैच खेल रहे रोड्रिगुइन्हो ने डिफेंडर्स एफसी के खिलाफ पाँच गोल दाग दिए थे और बिरसा मुंडा स्टेडियम उस सुकून भरी खामोशी में डूब चुका था, जो तब उतर आती है जब मैच का नतीजा लगभग तय हो जाता है। तभी 85वें मिनट में एक छोटी-सी घटना घटी।

एक देर से किया गया बदलाव, मैदान पर उतरी नई जोड़ी टाँगें, और जर्सी पर ऐसा नंबर जिसे शायद स्टेडियम में मौजूद बहुत कम लोग पहचानते थे। थोखचोम डायमंड सिंह ने बाईं ओर गेंद संभाली,

अपने मार्कर को शानदार अंदाज़ में छकाया और निचले कोने की ओर तेज़ शॉट लगाया। लेकिन डिफेंडर्स एफसी के गोलकीपर ने शानदार डाइव लगाकर गेंद को गोललाइन पार नहीं होने दिया।

यह सब शायद चार सेकंड से भी कम समय में हुआ। रोड्रिगुइन्हो के पाँच गोलों के सामने यह पल किसी हाइलाइट वीडियो में शायद कभी जगह न पाए। लेकिन अपने पहले सीनियर कॉन्ट्रैक्ट के महज़ तीन सप्ताह बाद मैदान पर उतरे 16 वर्षीय मिडफील्डर के लिए यही चार सेकंड सबसे बड़ी उपलब्धि थे।

बारह वर्षों की मेहनत, प्रशिक्षण और इंतज़ार के बाद आखिरकार वह उस क्षण तक पहुँच चुका था, जिसके लिए उसे बचपन से तैयार किया गया था।

टीवाईडीए से टैलेंट पाथवे तक डायमंड का सफर भारतीय फुटबॉल की युवा विकास प्रणाली का मानचित्र जैसा है—सीधा, स्पष्ट और लगातार आगे बढ़ता हुआ।

सिर्फ चार साल की उम्र में उन्होंने अपने गृह राज्य मणिपुर के बिष्णुपुर स्थित टीवाईडीए फुटबॉल अकादमी में फुटबॉल खेलना शुरू किया। यह उन छोटी लेकिन गंभीर अकादमियों में से एक है, जिनकी बदौलत मणिपुर वर्षों से भारतीय फुटबॉल को प्रतिभाशाली खिलाड़ी देता आया है।

इसके बाद उन्होंने एफसी इम्फाल सिटी फुटबॉल अकादमी का रुख किया, जो एआईएफएफ से मान्यता प्राप्त संस्था है और मणिपुर तथा पूर्वोत्तर भारत की युवा प्रतिभाओं को निखारने के उद्देश्य से स्थापित की गई है।

फिर वह सुदेवा दिल्ली के युवा सेटअप से जुड़े, उसके बाद भाईचुंग भूटिया फुटबॉल स्कूल्स पहुँचे। हर पड़ाव ने उनके खेल में एक नई परत जोड़ दी।

इसके बाद उनका चयन एआईएफएफ-फीफा टैलेंट अकादमी में हुआ, जिसे भारतीय फुटबॉल में उभरती प्रतिभाओं की सबसे बड़ी पाठशाला माना जाता है। यहीं से उन्हें बिबियानो फर्नांडिस की अगुआई वाली भारत अंडर-17 टीम में बुलावा मिला और फिर एएफसी अंडर-17 एशियन कप के लिए भारतीय टीम का हिस्सा बनने का मौका भी मिला।

डायमंड कहते हैं, मैंने चार साल की उम्र में अपने शहर की टीवाईडीए फुटबॉल अकादमी से खेलना शुरू किया था। उसके बाद मैं एक-एक कदम आगे बढ़ता गया। जब उनसे उनके सफर को किसी प्रेरणादायक कहानी की तरह बताने को कहा जाता है, तो वह ऐसा करने से बचते हैं।

उनके लिए यह किसी चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि लगातार मेहनत करते हुए हर अगले स्तर के लिए चुने जाने का सिलसिला था। आखिरकार उन्हीं पड़ावों में से एक उन्हें एससी दिल्ली की सीनियर टीम तक ले आया।

एशिया का सबसे पुराना टूर्नामेंट, भारत की नई प्रतिभा डायमंड सिंह के बिना भी डूरंड कप का महत्व कम नहीं होता। इस टूर्नामेंट की ट्रॉफियों पर 1888 से लेकर आज तक के विजेताओं के नाम दर्ज हैं।

दो विश्व युद्ध, भारत का विभाजन और वह दौर भी जब खुद ट्रॉफी वर्षों तक गायब रही और आज़ादी के बाद कमांडर-इन-चीफ के कार्यालय से दोबारा मिली—डूरंड कप इन सबका गवाह रहा है।

यह उस ब्रिटिश साम्राज्य से भी लंबा सफर तय कर चुका है जिसने इसकी शुरुआत की थी। आज यह हर साल देश के अलग- अलग शहरों—कोलकाता, गुवाहाटी, शिलांग, जमशेदपुर और रांची—की यात्रा करता है और अपने साथ 138 वर्षों की विरासत लेकर चलता है। दूसरी ओर, एससी दिल्ली भी हाल के वर्षों में अपनी अलग पहचान बना रही है।

डिफेंडर्स एफसी के खिलाफ डायमंड का वह छोटा-सा कैमियो उस ग्रुप चरण का हिस्सा था, जिसका अंत भारतीय वायु सेना फुटबॉल टीम पर 7-1 की शानदार जीत के साथ हुआ। तीनों मुकाबले जीतकर नौ अंक हासिल करने वाली एससी दिल्ली ने ग्रुप सी में शीर्ष स्थान हासिल किया और क्वार्टरफाइनल में जगह बनाई।

ऐसे में टीम के किनारे खड़े 16 वर्षीय खिलाड़ी के लिए बेंच से मैदान पर बिताया गया हर मिनट बेहद अहम हो जाता है। यह किसी औपचारिक मैच का 'डेड टाइम' नहीं था, बल्कि आगे आने वाली बड़ी चुनौतियों की तैयारी थी।

डूरंड कप जैसे टूर्नामेंट में, जो एक सदी से भी अधिक समय से प्रतिभा और गुणवत्ता की असली परीक्षा लेता आया है, हर मिनट की अपनी अहमियत होती है।

इस वर्ष डूरंड कप का 135वाँ संस्करण खेला जा रहा है, जिसमें भारतीय सेना की टीमें, इंडियन सुपर लीग के दिग्गज क्लब और अंतरराष्ट्रीय आमंत्रित टीमें तीन प्रतिष्ठित ट्रॉफियों—डूरंड कप, प्रेसिडेंट्स कप और शिमला ट्रॉफी—के लिए मुकाबला कर रही हैं।

इतिहास के बीच अपनी जगह बनाता एक किशोर

जब इस लंबे इतिहास के बीच जन्मा एक किशोर मैदान पर उतरता है, तो वह अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करता। जब उनसे पूछा गया कि अपने से लगभग दोगुनी उम्र के खिलाड़ियों के साथ इतने पुराने टूर्नामेंट में खेलना कैसा लगता है, तो उनका जवाब बेहद सधा हुआ था।

सीनियर टीमों के खिलाफ खेलकर मैंने बहुत कुछ सीखा है। शुरुआत में उनके खेल के अनुरूप खुद को ढालना थोड़ा मुश्किल था, लेकिन इससे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा है।

न कोई बड़ी-बड़ी बातें, न किस्मत या नियति की चर्चा। सिर्फ एक युवा खिलाड़ी, जो ईमानदारी से स्वीकार करता है कि अनुभवी खिलाड़ियों के स्तर तक पहुँचने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है।

मणिपुर की फुटबॉल विरासत यह भी महत्वपूर्ण है कि डायमंड मणिपुर से आते हैं। दशकों से यह राज्य भारतीय फुटबॉल की प्रतिभाओं की सबसे उपजाऊ भूमि रहा है। हर सीज़न आई-लीग और इंडियन सुपर लीग में खेलने वाले कई खिलाड़ी अपनी शुरुआत मणिपुर की अकादमियों और जिला लीगों से करते हैं।

डायमंड भी अपने राज्य के बारे में उसी सहज गर्व के साथ बात करते हैं। मणिपुर में कई बेहतरीन फुटबॉल अकादमियां हैं। मेरी होमटाउन अकादमी टीवाईडीए ने भी कई अच्छे खिलाड़ी तैयार किए हैं।

वहां की फुटबॉल संस्कृति लगातार आगे बढ़ रही है और खिलाड़ियों को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है। उनके लिए यह कोई शेखी नहीं, बल्कि एक सामान्य सच्चाई है। शायद इसी वजह से मणिपुर में किसी नए किशोर खिलाड़ी
का उभरना किसी को हैरान नहीं करता।

भारत अंडर-17 टीम के साथ बिताए गए समय को वह अपने करियर का अहम पड़ाव मानते हैं। भारत अंडर-17 टीम का हिस्सा बनने और उस माहौल में खेलने से मेरे समग्र विकास में बहुत मदद मिली। उनका यह साधारण-सा वाक्य उन वर्षों की मेहनत को अपने भीतर समेटे हुए है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती।

नाम के पीछे खड़े कई नाम

जब डायमंड से पूछा जाता है कि उन्हें सबसे अधिक प्रेरणा किससे मिली, तो वह किसी विश्व प्रसिद्ध खिलाड़ी का नाम नहीं लेते। वह अपने कोचों—चोई, विजय, राजू, रामानंदा और मेइराबा—के नाम गिनाने लगते हैं। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि कहीं किसी का नाम छूट न जाए।

बचपन से कई कोचों ने मेरी मदद की है, वह कहते हैं और फिर लगभग माफी मांगते हुए जोड़ते हैं कि अगर किसी का नाम छूट गया हो तो उन्हें क्षमा किया जाए।

यह छोटा-सा पल उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी झलक देता है। वह उन लोगों को कभी नहीं भूलते जिन्होंने मणिपुर की ठंडी सुबहों में उन्हें अभ्यास कराया, उस समय जब राज्य के बाहर कोई उनका नाम तक नहीं जानता था।
लेकिन उनका सबसे बड़ा आभार अपने माता-पिता के लिए है।

मेरे माता-पिता ने मेरे लिए सब कुछ किया है। उन्होंने बहुत मेहनत की। बचपन में कई बार ऐसा हुआ जब हमारे लिए
खाना या फुटबॉल का सामान खरीदना भी आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने दिन-रात मेहनत करके मेरी हर जरूरत पूरी की। आज मैं जो कुछ भी हूं, उनकी मेहनत की वजह से हूं।

इन शब्दों को किसी अतिरिक्त सजावट की जरूरत नहीं। फुटबॉल की सबसे सच्ची कहानियाँ अक्सर इसी सादगी में कही जाती हैं।

आगे का रास्ता

फिलहाल डायमंड के सपने भी उतने ही सरल हैं, जितने उनके जवाब। व्यक्तिगत स्तर पर वह ज्यादा से ज्यादा मैच खेलना चाहते हैं, अनुभव हासिल करना चाहते हैं और खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं।

मैं चाहता हूं कि मुझे ज्यादा खेलने का मौका मिले ताकि मैं बहुमूल्य अनुभव हासिल कर सकूं। और टीम के लिए उनका लक्ष्य बिल्कुल साफ है। आखिरकार हमारा लक्ष्य सिर्फ जीतना है।

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न पांच साल बाद खुद को कहाँ देखते हैं जैसी बड़ी बातें, न भविष्य के दावे। सिर्फ वही रास्ता, जो फुटबॉल में हमेशा सबसे अहम रहा है—खेलो, सीखो, बेहतर बनो और फिर दोबारा यही सिलसिला जारी रखो। रांची में उस बचाए गए शॉट के बाद खेल आगे बढ़ गया। रोड्रिगुइन्हो ने दो और गोल कर दिए। स्कोर 7-0 तक पहुँच गया।

लेकिन उस बड़ी जीत के बीच कहीं चार सेकंड का वह छोटा-सा पल भी था, जब इम्फाल का एक किशोर पहली बार डूरंड कप के मंच पर अपने सीनियर करियर की शुरुआत कर रहा था। वह अभी पूरी तरह तराशा हुआ खिलाड़ी नहीं है। लेकिन यह साफ दिखता है कि वह हर मैच, हर मिनट और डूरंड कप में हर अवसर के साथ खुद को गढ़ रहा है।

एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट ने ऐसे कई करियर शुरू होते देखे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि डायमंड सिंह की यह कहानी आगे किस मुकाम तक पहुँचती है।

रांची में दर्शक पहले ही सब कुछ देख चुके थे। एससी दिल्ली के लिए अपना पहला मैच खेल रहे रोड्रिगुइन्हो ने डिफेंडर्स एफसी के खिलाफ पाँच गोल दाग दिए थे और बिरसा मुंडा स्टेडियम उस सुकून भरी खामोशी में डूब चुका था, जो तब उतर आती है जब मैच का नतीजा लगभग तय हो जाता है। तभी 85वें मिनट में एक छोटी-सी घटना घटी।

एक देर से किया गया बदलाव, मैदान पर उतरी नई जोड़ी टाँगें, और जर्सी पर ऐसा नंबर जिसे शायद स्टेडियम में मौजूद बहुत कम लोग पहचानते थे।

थोखचोम डायमंड सिंह ने बाईं ओर गेंद संभाली, अपने मार्कर को शानदार अंदाज़ में छकाया और निचले कोने की ओर तेज़ शॉट लगाया। लेकिन डिफेंडर्स एफसी के गोलकीपर ने शानदार डाइव लगाकर गेंद को गोललाइन पार नहीं होने दिया।

यह सब शायद चार सेकंड से भी कम समय में हुआ। रोड्रिगुइन्हो के पाँच गोलों के सामने यह पल किसी हाइलाइट वीडियो में शायद कभी जगह न पाए।

लेकिन अपने पहले सीनियर कॉन्ट्रैक्ट के महज़ तीन सप्ताह बाद मैदान पर उतरे 16 वर्षीय मिडफील्डर के लिए यही चार सेकंड सबसे बड़ी उपलब्धि थे। बारह वर्षों की मेहनत, प्रशिक्षण और इंतज़ार के बाद आखिरकार वह उस क्षण तक पहुँच चुका था, जिसके लिए उसे बचपन से तैयार किया गया था।

टीवाईडीए से टैलेंट पाथवे तक

डायमंड का सफर भारतीय फुटबॉल की युवा विकास प्रणाली का मानचित्र जैसा है—सीधा, स्पष्ट और लगातार आगे बढ़ता हुआ। सिर्फ चार साल की उम्र में उन्होंने अपने गृह राज्य मणिपुर के बिष्णुपुर स्थित टीवाईडीए फुटबॉल अकादमी में फुटबॉल खेलना शुरू किया।

यह उन छोटी लेकिन गंभीर अकादमियों में से एक है, जिनकी बदौलत मणिपुर वर्षों से भारतीय फुटबॉल को प्रतिभाशाली खिलाड़ी देता आया है। इसके बाद उन्होंने एफसी इम्फाल सिटी फुटबॉल अकादमी का रुख किया, जो एआईएफएफ से मान्यता प्राप्त संस्था है और मणिपुर तथा पूर्वोत्तर भारत की युवा प्रतिभाओं को निखारने के उद्देश्य से स्थापित की गई है।

फिर वह सुदेवा दिल्ली के युवा सेटअप से जुड़े, उसके बाद भाईचुंग भूटिया फुटबॉल स्कूल्स पहुँचे। हर पड़ाव ने उनके खेल में एक नई परत जोड़ दी। इसके बाद उनका चयन एआईएफएफ-फीफा टैलेंट अकादमी में हुआ, जिसे भारतीय फुटबॉल में उभरती प्रतिभाओं की सबसे बड़ी पाठशाला माना जाता है।

यहीं से उन्हें बिबियानो फर्नांडिस की अगुआई वाली भारत अंडर-17 टीम में बुलावा मिला और फिर एएफसी अंडर-17 एशियन कप के लिए भारतीय टीम का हिस्सा बनने का मौका भी मिला। डायमंड कहते हैं, मैंने चार साल की उम्र में अपने शहर की टीवाईडीए फुटबॉल अकादमी से खेलना शुरू किया था। उसके बाद मैं एक-एक कदम आगे बढ़ता गया।

जब उनसे उनके सफर को किसी प्रेरणादायक कहानी की तरह बताने को कहा जाता है, तो वह ऐसा करने से बचते हैं। उनके लिए यह किसी चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि लगातार मेहनत करते हुए हर अगले स्तर के लिए चुने जाने का सिलसिला था। आखिरकार उन्हीं पड़ावों में से एक उन्हें एससी दिल्ली की सीनियर टीम तक ले आया।

एशिया का सबसे पुराना टूर्नामेंट, भारत की नई प्रतिभा

डायमंड सिंह के बिना भी डूरंड कप का महत्व कम नहीं होता। इस टूर्नामेंट की ट्रॉफियों पर 1888 से लेकर आज तक के विजेताओं के नाम दर्ज हैं। दो विश्व युद्ध, भारत का विभाजन और वह दौर भी जब खुद ट्रॉफी वर्षों तक गायब रही और आज़ादी के बाद कमांडर-इन-चीफ के कार्यालय से दोबारा मिली—डूरंड कप इन सबका गवाह रहा है।

यह उस ब्रिटिश साम्राज्य से भी लंबा सफर तय कर चुका है जिसने इसकी शुरुआत की थी। आज यह हर साल देश के अलग- अलग शहरों—कोलकाता, गुवाहाटी, शिलांग, जमशेदपुर और रांची—की यात्रा करता है और अपने साथ 138 वर्षों की विरासत लेकर चलता है।

दूसरी ओर, एससी दिल्ली भी हाल के वर्षों में अपनी अलग पहचान बना रही है। डिफेंडर्स एफसी के खिलाफ डायमंड का वह छोटा-सा कैमियो उस ग्रुप चरण का हिस्सा था,

जिसका अंत भारतीय वायु सेना फुटबॉल टीम पर 7-1 की शानदार जीत के साथ हुआ। तीनों मुकाबले जीतकर नौ अंक हासिल करने वाली एससी दिल्ली ने ग्रुप सी में शीर्ष स्थान हासिल किया और क्वार्टरफाइनल में जगह बनाई।

ऐसे में टीम के किनारे खड़े 16 वर्षीय खिलाड़ी के लिए बेंच से मैदान पर बिताया गया हर मिनट बेहद अहम हो जाता है। यह किसी औपचारिक मैच का डेड टाइम नहीं था, बल्कि आगे आने वाली बड़ी चुनौतियों की तैयारी थी।

डूरंड कप जैसे टूर्नामेंट में, जो एक सदी से भी अधिक समय से प्रतिभा और गुणवत्ता की असली परीक्षा लेता आया है, हर मिनट की अपनी अहमियत होती है।

इस वर्ष डूरंड कप का 135वाँ संस्करण खेला जा रहा है, जिसमें भारतीय सेना की टीमें, इंडियन सुपर लीग के दिग्गज क्लब और अंतरराष्ट्रीय आमंत्रित टीमें तीन प्रतिष्ठित ट्रॉफियों—डूरंड कप, प्रेसिडेंट्स कप और शिमला ट्रॉफी—के लिए मुकाबला कर रही हैं।

इतिहास के बीच अपनी जगह बनाता एक किशोर

जब इस लंबे इतिहास के बीच जन्मा एक किशोर मैदान पर उतरता है, तो वह अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करता। जब उनसे पूछा गया कि अपने से लगभग दोगुनी उम्र के खिलाड़ियों के साथ इतने पुराने टूर्नामेंट में खेलना कैसा लगता है, तो उनका जवाब बेहद सधा हुआ था।

सीनियर टीमों के खिलाफ खेलकर मैंने बहुत कुछ सीखा है। शुरुआत में उनके खेल के अनुरूप खुद को ढालना थोड़ा मुश्किल था, लेकिन इससे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा है।

न कोई बड़ी-बड़ी बातें, न किस्मत या नियति की चर्चा। सिर्फ एक युवा खिलाड़ी, जो ईमानदारी से स्वीकार करता है कि अनुभवी खिलाड़ियों के स्तर तक पहुँचने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है।

मणिपुर की फुटबॉल विरासत

यह भी महत्वपूर्ण है कि डायमंड मणिपुर से आते हैं। दशकों से यह राज्य भारतीय फुटबॉल की प्रतिभाओं की सबसे उपजाऊ भूमि रहा है। हर सीज़न आई-लीग और इंडियन सुपर लीग में खेलने वाले कई खिलाड़ी अपनी शुरुआत मणिपुर की अकादमियों और जिला लीगों से करते हैं।

डायमंड भी अपने राज्य के बारे में उसी सहज गर्व के साथ बात करते हैं। मणिपुर में कई बेहतरीन फुटबॉल अकादमियां हैं। मेरी होमटाउन अकादमी टीवाईडीए ने भी कई अच्छे खिलाड़ी तैयार किए हैं। वहां की फुटबॉल संस्कृति लगातार आगे बढ़ रही है और खिलाड़ियों को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है।

उनके लिए यह कोई शेखी नहीं, बल्कि एक सामान्य सच्चाई है। शायद इसी वजह से मणिपुर में किसी नए किशोर खिलाड़ी का उभरना किसी को हैरान नहीं करता। भारत अंडर-17 टीम के साथ बिताए गए समय को वह अपने करियर का अहम पड़ाव मानते हैं।

भारत अंडर-17 टीम का हिस्सा बनने और उस माहौल में खेलने से मेरे समग्र विकास में बहुत मदद मिली। उनका यह साधारण-सा वाक्य उन वर्षों की मेहनत को अपने भीतर समेटे हुए है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती।

नाम के पीछे खड़े कई नाम

जब डायमंड से पूछा जाता है कि उन्हें सबसे अधिक प्रेरणा किससे मिली, तो वह किसी विश्व प्रसिद्ध खिलाड़ी का नाम नहीं लेते। वह अपने कोचों—चोई, विजय, राजू, रामानंदा और मेइराबा—के नाम गिनाने लगते हैं। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि कहीं किसी का नाम छूट न जाए।

बचपन से कई कोचों ने मेरी मदद की है, वह कहते हैं और फिर लगभग माफी मांगते हुए जोड़ते हैं कि अगर किसी का नाम छूट गया हो तो उन्हें क्षमा किया जाए।

यह छोटा-सा पल उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी झलक देता है। वह उन लोगों को कभी नहीं भूलते जिन्होंने मणिपुर की ठंडी सुबहों में उन्हें अभ्यास कराया, उस समय जब राज्य के बाहर कोई उनका नाम तक नहीं जानता था।

लेकिन उनका सबसे बड़ा आभार अपने माता-पिता के लिए है। मेरे माता-पिता ने मेरे लिए सब कुछ किया है। उन्होंने बहुत मेहनत की। बचपन में कई बार ऐसा हुआ जब हमारे लिए खाना या फुटबॉल का सामान खरीदना भी आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने दिन-रात मेहनत करके मेरी हर जरूरत पूरी की।

आज मैं जो कुछ भी हूं, उनकी मेहनत की वजह से हूं। इन शब्दों को किसी अतिरिक्त सजावट की जरूरत नहीं। फुटबॉल की सबसे सच्ची कहानियाँ अक्सर इसी सादगी में कही जाती हैं।

आगे का रास्ता

फिलहाल डायमंड के सपने भी उतने ही सरल हैं, जितने उनके जवाब। व्यक्तिगत स्तर पर वह ज्यादा से ज्यादा मैच खेलना चाहते हैं, अनुभव हासिल करना चाहते हैं और खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं।

मैं चाहता हूं कि मुझे ज्यादा खेलने का मौका मिले ताकि मैं बहुमूल्य अनुभव हासिल कर सकूं। और टीम के लिए उनका लक्ष्य बिल्कुल साफ है। आखिरकार हमारा लक्ष्य सिर्फ जीतना है। न पांच साल बाद खुद को कहाँ देखते हैं जैसी बड़ी बातें, न भविष्य के दावे।

सिर्फ वही रास्ता, जो फुटबॉल में हमेशा सबसे अहम रहा है—खेलो, सीखो, बेहतर बनो और फिर दोबारा यही सिलसिला जारी रखो। रांची में उस बचाए गए शॉट के बाद खेल आगे बढ़ गया। रोड्रिगुइन्हो ने दो और गोल कर दिए। स्कोर 7-0 तक पहुँच गया।

लेकिन उस बड़ी जीत के बीच कहीं चार सेकंड का वह छोटा-सा पल भी था, जब इम्फाल का एक किशोर पहली बार डूरंड कप के मंच पर अपने सीनियर करियर की शुरुआत कर रहा था। वह अभी पूरी तरह तराशा हुआ खिलाड़ी नहीं है। लेकिन यह साफ दिखता है कि वह हर मैच, हर मिनट और डूरंड कप में हर अवसर के साथ खुद को गढ़ रहा है।

एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट ने ऐसे कई करियर शुरू होते देखे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि डायमंड सिंह की यह कहानी आगे किस मुकाम तक पहुँचती है।

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