श्रद्धा कपूर की अपकमिंग फिल्म ‘ईठा’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है, जिसे देखकर लोग अभिनेत्री की तारीफें करते नहीं थक रहे। मैडॉक फिल्म्स और कठपुतली क्रिएशन्स की ‘ईठा’ एक म्यूजिकल ड्रामा फिल्म है।
ये फिल्म एक ऐसे असाधारण कलाकार की कहानी है जो महाराष्ट्र की मशहूर आर्टिस्ट रही हैं। उन्होंने बतौर कलाकार ऐसा संघर्ष देखा है, जिसमें तमाम बाधाओं और चुनौतियों के बाद भी वो उसी कला में डूब जाना पसंद करती थीं।
श्रद्धा की फिल्म में उनका यह किरदार कई लेयर में नजर आ रहा, जहां मंच पर चकाचौंध और ग्लैमर भी उसके लिए है, वहीं दुख और दर्द से भरी टीस भी दिख रही है। ‘स्त्री 2’ एक्ट्रेस ने अपने इस नए अंदाज से लोगों का दिल जीत लिया है।
श्रद्धा का ये किरदार बेहद गंभीर और प्रभावशाली है। इस फिल्म में श्रद्धा का किरदार अकेली नहीं बल्कि उन तमाम महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती है जो हालात के आगे झुकने के बजाय अपने जुनून और कला के लिए मर जाना पसंद करती हैं।
इस ट्रेलर की शुरुआत श्रद्धा के कुछ डांस सीक्वेंस से हो रही है, जिसके बाद वो अंदर से टूटी और बिखरी दिख रहीं। वो अपने ही पोस्टर पर अपना गुस्सा जाहिर करती हैं और पत्थर उठाकर फेंकती हैं। इस दौना वो खुद से बातें करते हुए कहती हैं, ‘तुम्हीं ने कहा था न, देखते हैं क्या टूटता है, मेरा भरोसा या मेरा घमंड। मेरा भरोसा ही मेरा घमंड था रे। जब वो टूट गया न सब टूट गया।’
और फिर शुरू होती है रंगमंच की वो दुनिया जहां लोगों की भीड़ और तालियों की गूंज से जोरदार स्वागत हो रहा है। और फिर बैकग्राउंड में कोई कहता है, ‘एक बार इतना ही भरोसा अपने आप पर कर ले, तुमसे तो नाच के मामले में तकदीर भी नहीं जीत सकती। बिना नाचे जाएगी क्या?’ ट्रेलर की इन झलकियों में सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलू के साथ-साथ परंपरा, पहचान और आत्मसम्मान भी है।
वहीं इस ट्रेलर में रणदीप हुड्डा भी नजर आ रहे हैं। हालांकि, यहां इनके किरदार का पत्ता पूरी तरह से नहीं खोला गया है, जो फिल्म में ‘मर्चेंट’ का रोल निभा रहे हैं। ‘ईठा’ की रिलीज की बात करें तो ये फिल्म 4 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है।
‘ईठा’ में श्रद्धा कपूर, रणदीप हुड्डा, मोहम्मद जीशान अय्यूब सहित कई अन्य स्टार्स भी होंगे। ट्रेलर देखकर लोगों ने कहा- स्त्री के बाद एक और शानदार फिल्म।
महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध तमाशा कलाकार, लावणी नर्तकी और लोक गायिका थीं विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर। 1 जुलाई 1935 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में एक दलित परिवार में उनका जन्म हुआ था और 15 जनवरी 2002 उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
उन्होंने बहुत कम उम्र से ही पारंपरिक तमाशा और लावणी नृत्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्हें कला के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए राष्ट्रपति पदक (1957 और 1990) से सम्मानित किया गया था।
हालांकि, उन्हें शोहरत बहुत मिली लेकिन आर्थिक तंगी से काफी परेशान भी। उनके नाम से महाराष्ट्र सरकार ने 2006 से ‘विठाबाई नारायणगांवकर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ की शुरुआत की।
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